Category: वचनामृत – अन्य
विश्वास
कीमती सूट का कपड़ा दर्जी को देते समय विश्वास करते हो ना ! तो गुरू/भगवान पर क्यों नहीं कर सकते ? आर्यिका श्री सोहार्दमति माताजी
आसक्ति
आसक्ति से अभिव्यक्ति में अंतर आ जाता है । आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
चोरी
संसार को अपना मानना चोट्टापन ही तो है । जो अपना नहीं है, उसे अपना मानना चोरी ही तो है । क्षु. श्री गणेशप्रसाद वर्णी
तप
तप करता शरीर है, पर बिना मन के नहीं होता है और मन की शुद्धि के लिये ही तप किया जाता है । मुनि श्री
समता/ममता
समता की जरूरत तभी तक है, जब तक हमारे अंदर ममता (मोह) है । क्षु. श्री गणेशप्रसाद वर्णी जी
विनय
विनय से पढ़ा गया शास्त्र विस्मृत हो जाने पर भी परभव में केवलज्ञान का कारण बनता है । आचार्य श्री विद्यासागर जी
अनुकम्पा
दयावान हिंसा से दूर रहता है । उसका अंतरंग शुद्ध होता है । आचार्य श्री महाश्रवण जी
संकोच
सबसे बड़ा ऐव संकोच है, यही हमारे कल्याण में बाधक है । यह आता है, इस भाव से कि – हम सबको प्रसन्न रखें ।
चमत्कार
चमत्कार को नमस्कार नहीं, पर नमस्कार (समर्पण) करने के बाद चमत्कार होने लगते हैं । आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
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