Category: वचनामृत – अन्य
कर्म
आग जले, धुंआ न उठे; पानी बरसे , कीचड़ न हो; कर्म करें मगर अहं से न भरें । आचार्य श्री पुष्पदंतसागर जी
स्थिरता
घड़ी टिक-टिक करके हर क्षण यह याद दिलाती है कि टिक (जीवन में स्थिरता ला) | आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
बंधन
हम तो वंदन में भी बंधन रखते हैं , समय का/घर जल्दी लौटने का । आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
मानवता
हवन/पूजा में टनों घी की आहुती दे देते हैं, पर माँ बाप को रोटी पर घी लगाने को नहीं देते हैं । आचार्य श्री विशुद्धसागर
प्रिय सत्य
एक शेर को अपना मंत्री नियुक्त करना था, उसने सब जानवरों को बुला कर पूँछा – मेरे मुँह से कैसी गंध आती है ? गधे
मोह
जो काम बांबी का साँप नहीं कर पाता, वह आस्तीन का साँप करता है । (औलाद बनकर दुश्मनी निकालते हैं) मुनि श्री सुधासागर जी
ज्ञान
ज्ञान थोड़ा थोड़ा भी अंदर जाता रहेगा, तो एक दिन बाहर उद्घाटित होगा ही । आचार्य श्री विशुद्धसागर जी
दिखावा
जीवन में तो माता-पिता को पानी नहीं पिलाते, मरने पर गंगा में सिराने(बहाने) बड़े ठाटबाट से जाते हैं । आचार्य श्री विशुद्धसागर जी
टोकना
घड़ी लगातार टिक टिक करती रहती है, पर क्या टिक टिक की आवाज़ पर कोई गौर करता है ! पर घंटों की आवाज़ पर हर
धर्म
धर्म में फायदा हो या ना हो, पर घाटा कभी नहीं होता । यह उपवन है यहां मन कभी नहीं लगाना पड़ता । आर्यिका श्री
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