Category: वचनामृत – अन्य
मुखिया
घर का मुखिया मुख की तरह होना चाहिए । मुख खाना खाकर शरीर (परिवार/समाज) के सब अंगों तक बिना भेदभाव के पहुँचाता है । मुनि
आशीष
शीश की सार्थकता तो गुरूजनों से आशीष लेने में ही है । आर्यिका श्री सौभाग्यमति माताजी
दया/याद
‘दया’ का उल्टा ‘याद’ है, याद रखने के लिये, बच्चों का नाम ‘दया’ रख लें । आर्यिका श्री सौभाग्यमति माताजी
फ़ोकटी
माँगे का मठा, मोल से भी मंहगा पड़ता है । आर्यिका श्री सौभाग्यमति माताजी
विकल्प
विकल्प यदि सस्ता होगा, तो फल मंहगा पड़ेगा । आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
संग्रह/लिप्सा
संग्रह लोभ से करते हैं, लिप्सा अति लोभ से करते हैं । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
सुखी
सुखी दो ही तरह के लोग होते हैं – 1. बच्चा 2. सच्चा मुनि श्री सुनील सागर जी
संवाद
वाद (बहस) से ही विवाद होता है । पर, बोली यदि खत्म कर दी, तो गोली का काम करेगी । मुनि श्री मुनिसागर जी
गलती
एक बार गलती स्वभाव है, बार बार गलती विभाव है । मुनि श्री सौरभसागर जी
चारित्र
पूज्यों/बड़ों/गुणवानों के चरणों में सिर झुकाने की परम्परा इसलिये है क्योंकि अपने यहाँ चारित्र की प्रमुखता है । चरण आचरण के प्रतीक होते हैं, सिर
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