Category: वचनामृत – अन्य
Senior Citizen
Senior Citizen होने पर बड़ी-बड़ी तीर्थयात्राएँ नहीं हो पातीं तो क्या करें ? Senior होने से पहले बड़ी-बड़ी यात्राएँ पूरी कर लें। आचार्य श्री विद्यासागर
दुर्जन
दुर्जन, जिसको अवगुण ही दिखायी दें/ उनकी Publicity करे, गुणों पर दृष्टि ही न जाये। महादुर्जन जो गुणों को भी अवगुण मानकर फैलाये। निर्यापक मुनि
शोधन
भोजन में बाल आदि आने पर उसे निकाल कर बाहर फेंक देते हैं। कटु वचन/घटना को ? उसे तो सर पर बैठा लेते हैं, वह
पुरुषार्थ
प्राय: लोग कहते हैं –> हम पुरुषार्थ नहीं कर सकते हैं। पर हम भूल जाते हैं कि मनुष्य गति, अच्छा कुल आदि पाने के लिये
स्थिति
परिस्थिति जो “पर” में स्थित हो। यह आपके हाथ नहीं। लेकिन पूरा पुरुषार्थ करने तथा आशावान रहने से स्व-स्थिति बदल जाती है। तब परिस्थिति भी
धर्म
धर्म स्व-आश्रित ही नहीं, पर निमित्तक भी है। साधुजन भी गृहस्थों की भोजन व्यवस्था लेते हैं। काया के आश्रित तो साधु तथा गृहस्थ दोनों रहते
सच्ची मिठास
ना काफ़ी (मिठास), नाही फीका, सच्ची मिठास प्राकृतिक। काफ़ी मिठास – जलेबी में पर मायाचारी का प्रतीक, फीका मिठास – रसगुल्ले में पर मिलावटी (पनीर
लोरी
संसारी माँ बच्चों को लोरी सुलाने के लिये सुनाती है। धर्म-माँ* बड़ों को जगाने के लिये। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी *जिनवाणी (धार्मिक ग्रंथ)/ गुरु-वाणी।
आदर्श
खाओ-पीओ, चखो मत; देखो-भालो, तको मत; हँसो-बोलो, बको मत; खेलो-कूदो, थको मत। मुनि श्री मंगलानन्दसागर जी
आत्मा / अनात्मा
प्राय: दूसरों से अधिक से अधिक सुख लेना चाहते हैं। जैसे मिठाई मेरी थाली में है पर Common में से पहले और ज्यादा से ज्यादा
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