Category: वचनामृत – अन्य
पाप क्रियाओं के लिये धर्म
पाप क्रियाओं के लिये धर्म करने से सफलता तो मिलेगी पर उसका अंत-फल सही नहीं आयेगा, जैसे रावण का अंत-फल । मुनि श्री सुधासागर जी
धर्म में धन
धन, धर्म-प्रभावना में आवश्यक, धर्म-साधना में बाधक । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
पुरुषार्थ / धर्मध्यान
पैर का काँटा, धर्म करने से नहीं पुरुषार्थ से निकलेगा । पर धर्मध्यान से काँटे की वेदना जरूर कम हो जायेगी । मुनि श्री सुधासागर
सहनशीलता
हथौड़ी कांच पर गिरे तो चकनाचूर, सोने पर गिरे तो चमक । हम क्या हैं ? और क्या बनना चाहते हैं ? मुनि श्री प्रमाणसागर
परम्परा
गुरु-परम्परा के ऊपर आगम-परम्परा होती है । आगम-परम्परा में भी, सबसे पुरानी वाली को मान्य मानें । मुनि श्री सुधासागर जी
गुरु-दर्शन
गुरु के समीप ही नहीं पहुँच पाते, दूर से ही दर्शन होते हैं तो दूरदर्शन पर क्यों ना करें ? सूर्य दूरदर्शन पर दिखेगा तो
सच्चा आनंद
अभाव में भी सद्भाव जैसा आनंद ही सच्चा है । मुनि श्री विनिश्चयसागर जी
गिरना
यदि डूबते हुये को बचाने के लिये एक सीढ़ी नीचे उतरना पड़े तो उतरने में पाप नहीं लगेगा । (पर बचाने की प्रक्रिया में सीढ़ी
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