Category: वचनामृत – अन्य
निमित्त / उपादान
निमित्त माचिस की जलती हुई तीली है, इससे अपने ज्ञान का दीपक जल्दी जलाओ, क्योंकि तीली तो थोड़ी देर तक ही जलती है । मुनि
बीजाक्षर
बीजाक्षर के अर्थ इसलिये नहीं मिलते क्योंकि अलग अलग अपेक्षाओं से इनके अलग अलग/बहुत से अर्थ होते हैं । मुनि श्री सुधासागर जी
भेड़चाल
ढ़ोल बजते ही नाचना न शुरू कर दें, यह तो देख लें कि ढ़ोल जन्म की खुशी के हैं या मातम के ! मुनि श्री
वैराग्य
शमशान जाने पर वैराग्य भाव प्राय: सभी के आते हैं, पर टिकते इसलिये नहीं क्योंकि वैराग्य का भाव-रूपी-बीज हम बंजर भूमि(धर्म-रूपी-आद्रता का अभाव) में डालते
दुर्जन
दुर्जन वह नहीं जो बुरे काम करे, बल्कि वह जो समझाने पर समझे नहीं । मुनि श्री सुधासागर जी
दया / कृपा
गुरु शिष्यों पर/ डॉक्टर मरीज़ों पर दया नहीं, कृपा करते हैं । मुनि श्री विनिश्चयसागर जी
कार्यसिद्धी
श्रावक के धन और तन रूपी दीपक में जब गुरु के मन और वचन रूपी घी और बाती आ जाती है, तब प्रकाश होता है/सामाजिक
नियम संशोधन
नियम लेने के बाद पता लगे कि वह आगम विरुद्ध है, तो 108 बार णमोकार मंत्र पढ़कर सुधार लें । क्षु. श्री ध्यानसागर जी (यदि
चारित्र
सम्यग्दृष्टि यदि चारित्र ना ग्रहण करे तो अनंतकाल तक भटकेगा । मिथ्यादृष्टि चारित्र धारण कर ले तो निकट सुगति । चा. च. आ. श्री शांतिसागर
दु:ख में व्यवहार
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज जब कभी समस्या में होते हैं तो खूब हँसते/हंसाते हैं, जैसे सुदामा ने अपनी परेशानियाँ श्री कृष्ण को पूछने पर
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