Category: वचनामृत – अन्य
मुनि
आदिनाथ भगवान के समय से लेकर पंचम काल के अंत तक तीनों प्रकार के मुनि थे, हैं और रहेंगे । भाव/द्रव्य/भ्रष्ट लिंगी । मुनि श्री
पीछी
श्रावकों को पीछी का उपयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि यह मुनियों का उपकरण है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
योग / उपयोग
योग से शरीर और मन नियंत्रित, उपयोग से चेतना । मुनि श्री सुधासागर जी
आचार्य कुंदकुंद और विदेह यात्रा
यदि आचार्य कुंदकुंद ने सीमंधर स्वामी के दर्शन किये होते तो वे कहीं तो लिखते – कि साक्षात सीमंधर भगवान ने ऐसा कहा था ।
नियति
भरत को सब ओर से दबाब ड़ाला गया कि वे अयोध्या की गद्दी पर बैठें – माँ, गुरू, राम सबने । भरत – मेरे भाग्य
त्रस
पंचास्तिकाय में वायु/अग्निकायिक को त्रस, उनकी स्वगति की अपेक्षा कहा है । मुनि श्री सुधासागर जी
अनुमान / अनुभव
अनुमान अप्रत्यक्ष, अनुभव प्रत्यक्ष । कभी कभी अनुमान अनुभव से ज्यादा कारगर हो जाता है, जैसे ज़हर खाने से मृत्यु हो जाती है । मुनि
दिगम्बरत्व
वैज्ञानिक को अद्भुत (संसारिक) सिद्धांत मिल गया तो निर्वस्त्र होकर सड़क पर दौड़ता हुआ युरेका युरेका पुकारने लगा । दिगम्बर साधू को तो अद्भुत आत्मिक
जिनवाणी और संतोष
भगवान की वाणी का अमृतपान करके भी जीवन में संतोष क्यों नहीं आ रहा है ? अमृत पीने से संतोष आये ही, ऐसा नियम नहीं
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