Category: वचनामृत – अन्य

मुनि

आदिनाथ भगवान के समय से लेकर पंचम काल के अंत तक तीनों प्रकार के मुनि थे, हैं और रहेंगे । भाव/द्रव्य/भ्रष्ट लिंगी । मुनि श्री

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पीछी

श्रावकों को पीछी का उपयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि यह मुनियों का उपकरण है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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योग / उपयोग

योग से शरीर और मन नियंत्रित, उपयोग से चेतना । मुनि श्री सुधासागर जी

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363 मत

इतने मत हुंडावसर्पिणी के प्रभाव से होते हैं। मुनि श्री सुधासागर जी

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नियति

भरत को सब ओर से दबाब ड़ाला गया कि वे अयोध्या की गद्दी पर बैठें – माँ, गुरू, राम सबने । भरत – मेरे भाग्य

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त्रस

पंचास्तिकाय में वायु/अग्निकायिक को त्रस, उनकी स्वगति की अपेक्षा कहा है । मुनि श्री सुधासागर जी

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अनुमान / अनुभव

अनुमान अप्रत्यक्ष, अनुभव प्रत्यक्ष । कभी कभी अनुमान अनुभव से ज्यादा कारगर हो जाता है, जैसे ज़हर खाने से मृत्यु हो जाती है । मुनि

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दिगम्बरत्व

वैज्ञानिक को अद्भुत (संसारिक) सिद्धांत मिल गया तो निर्वस्त्र होकर सड़क पर दौड़ता हुआ युरेका युरेका पुकारने लगा । दिगम्बर साधू को तो अद्भुत आत्मिक

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जिनवाणी और संतोष

भगवान की वाणी का अमृतपान करके भी जीवन में संतोष क्यों नहीं आ रहा है ? अमृत पीने से संतोष आये ही, ऐसा नियम नहीं

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मंगल आशीष

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