Category: वचनामृत – अन्य

श्रद्धा

जहाँ मन टिक जाए, उस पर श्रद्धा होती है । जिस पर श्रद्धा होती है, उस पर मन लगता है । क्षु. श्री ध्यानसागर जी

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सुधारना

सुधारने से नहीं, (ख़ुद) सुधरने से सुधरते हैं । ऐसे सुधरे मुड़ जाते हैं, फिर मुड़कर नहीं देखते हैं । क्षु. श्री ध्यानसागर जी

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संस्कार

पानी जब तक हाथ में है तब तक कैसा भी आकार दे दो; छूटने के बाद क्या आकार लेगा, कोई नहीं जानता । श्री रत्नसुंदर

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दु:ख का कारण

एक महिला, जहाँ भी उँगली रखती, उसे ही कोसती क्योंकि उसकी उँगली में दर्द होने लगता था, उँगली में फ्रैक्चर था । तो, दर्द का

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पाप / पुण्य / मुक्ति

प्राय: धार्मिक जन पाप-पुण्य/नरक-स्वर्ग की बातें करते हैं । ज्ञानी, पाप-पुण्य से परे, मुक्ति की । मुनि श्री सौम्यसागर जी

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मन

मन का स्वभाव सकारात्मक है । उसे मना करोगे तो वह मानेगा नहीं, उसे बताओ कि उसे क्या करना है, वह करेगा । तब मन

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सत्य

साधु यदि गाय को कसाई से बचाने के लिये झूठ बोलता है, वह सत्य तो नहीं, पर सत्य(अहिंसा)धर्म अवश्य है । मुनि श्री सुधासागर जी

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हीरा / कंकड़

हीरे का उपयोग यदि हीरे जैसा ना करें तो कंकड़ और हीरे में फ़र्क़ क्या रहा ? मनुष्य और जानवर में क्या फ़र्क़ रह गया

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भाव

दोषी को दोषी माना तो द्वेष होगा, दोषी को रोगी मानो, सहानुभूति होगी/भाव सुधरेंगे । क्षु. श्री गणेशप्रसाद वर्णी जी

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मंगल आशीष

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