Category: अगला-कदम

उदयाभावी

उदयाभावी… अनंतानुबंधी का उदय, अप्रत्याख्यानादि 12 कषाय रूप संक्रमित होकर पर-मुख से उदय में आते रहना। श्री मरणमंडिका

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आनुपूर्वी

आनुपूर्वी… सिर्फ़ विग्रहगति में उदय (पूर्व आकार बनाए रखना) जैसे नरकगत्यानुपूर्वी –> नरक की ओर गति कराना। इस दौरान तीनों का उदय रहता है (नरकगत्यानुपूर्वी,

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धर्म / व्रत

धर्म आत्मा का स्वभाव जैसे क्षमा धर्म आदि। व्रत से आत्मा के स्वभाव में अवरोधक तत्त्वों को रोकना जैसे अपरिग्रह व्रतादि। व्रत साधन हैं, धर्म

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भाव

पहले भाव फिर मन। यदि यह क्रम न हो तो असंज्ञियों के भाव बनेगा ही नहीं। आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी

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छद्मस्थ

छद्मस्थ… जिनकी आत्मा में आवरण स्थित है। सूत्र (9/10) में दसवें गुणस्थान के बाद आया है सो ज्ञान/दर्शनावरण ही लेना। सैद्धांतिक दृष्टि से 1-10 गुणस्थान

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जीव विपाकी

जीव विपाकी… सूक्ष्म/ बादर –> जीव की परिणति है। आदेय –> यशस्वी, कीर्तिवान, लोकमान्य। तीर्थंकर प्रकृति –> महसूस करते हैं, अहंकार नहीं करते। मुनि श्री

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नय

संसार दोनों नयों से चलता है। नित्य/अनित्य, व्यवहार (भेदरूप)/निश्चय (अभेदरूप)। काना (एक आँख वाला) अपशकुन माना जाता है, मिथ्यादृष्टि। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

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अनुभाग-बंध

“विपाकोनुभव:” तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8/21 अनुभाग तथा अनुभव एकार्थक; तथा भिन्नार्थक भी… अनुभाग…कर्मबंध के समय की शक्ति। अनुभव…कर्मफल के समय की शक्ति। मुनि श्री

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ज्ञान

कोरे काग़ज़ पर सही पता….सम्यग्ज्ञान, कोरे काग़ज़ पर ग़लत पता…मिथ्याज्ञान। चिंतन

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निकाचित

निधत्ति निकाचित कर्म देवदर्शन से समाप्त। दूसरे मतानुसार आठवें गुणस्थान में। दोनों मतों में सामंजस्य ? चौथे से आठवें गुणस्थान में… प्रथमानुयोग/ चरणानुयोग से चौथे

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मंगल आशीष

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