Category: अगला-कदम

हुंडावसर्पिणी

हुंडावसर्पिणी दस कोड़ाकोड़ी सागर का, यानि सुखमा-सुखमा से लेकर दुखमा-दुखमा तक होता है, चाहे 1, 2, 6ठे काल में इसका प्रभाव दिखे या न दिखे

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मतमतांतर

स्वयंम्भूरमण द्वीप में इतनी विशुद्धि कि स्वर्ग मुख्यरूप से वहीं से भरता है । जबकि वहाँ देव, शास्त्र, गुरु तथा आयतन भी नहीं हैं, फिर

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नय

व्यवहार नय – पिता/पुत्र की अपेक्षा, “पर” सापेक्ष, भेद रूप, दर्जी द्वारा कपड़े के टुकड़े करना, निश्चय तक पहुँचाता है । निश्चय नय – पिता/पुत्र

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ध्यान

ध्यान के लिये – 1. शुभ Object का ज्ञान 2. आत्मा पर श्रद्धान 3. प्रत्याहार – अन्य विषयों पर से ध्यान हटाना 4. धारणा –

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पाप

प्रवचनसार-गाथा-233 में >> हिंसा से प्रमाद व कर्मबंध कहा और गाथा 234 में परिग्रह होने मात्र से हिंसा और कर्मबंध कहा है, बाकी 3 पापों

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पुदगल / आत्मा / परमात्मा

तीनों को प्रत्यक्ष उदाहरण से समझाइए ? प्रश्नकर्ता की पिटाई चालू कर दी । वह चिल्लाने लगा – प्रभु! बचाओ-बचाओ । जो पिट रहा था

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गारव

गर्व का सूक्ष्म भाव; अंतरंग – जैसे “सात गारव”…. सर्व सुख/ साता/ चैन की वंशी/ औरों से बहुत बेहतर हूँ । मुनि श्री प्रण्म्यसागर जी

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भगवान का शरीर

1. अंतराय समाप्त सो अनंतवीर्य, इसलिये नामकर्म वर्गणायें लेने में लाभांतराय नहीं । 2. शरीर परमौदारिक (शुक्लध्यान से 12 गुणस्थान में शरीर शुद्ध) सो… कवलाहार

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उपयोग

1. अशुभोपयोग में यदि आयुबंध हुआ तो कुमानुष, देव भी बने तो भवनत्रिक । पापबंध तो होगा ही । 2. शुभोपयोग में सब शुभ करने

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मंगल आशीष

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