कोरोना जैसी महामारी से भी सीखो…सब संबंध धोखे के हैं,
हर व्यक्ति को छूने से भी डरो/ सावधानी बरतो चाहे वह अपना ही बच्चा क्यों न हो/ अपना ही शरीर क्यों न हो !

मुनि श्री सुधा सागर जी

जो सेवा की जाती है, वह सकाम सेवा है ;
जो सेवा होती है, वह निष्काम सेवा है

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

*विपत्ति के समय निष्काम सेवा ही श्रेष्ठ सेवा है*

3 प्रकार की –
1. श्वान जैसी – जहाँ जहाँ मालिक जाता है, उसके पीछे पीछे चले ।
2. बिल्ली जैसी – कभी साथ, कभी नहीं ।
3. चूहे जैसी – अपना बिल बना लिया, मालिक आये या जाये ।

मुनि श्री सुधासागर जी

आप शिष्यों को अपने से इतनी दूर भेज देते हैं, उनसे संम्प्रेषण कैसे होता है ?
बिजली का खंभा कितनी भी दूर हो पर Connection* हो तो घर प्रकाशित होगा ना !

आचार्य श्री विद्यासागर जी

*गुरु आज्ञा/शिष्य की श्रद्धा

आलोचना से लोचन खुलते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

इसलिये आलोचना का स्वागत करो (स्व+आगत)(अच्छे से बुलाना – पं.रतनलाल बैनाडा जी),
स्व का हितकारी/प्रिय मानकर ।

मुनि श्री सुधासागर जी

परोपकार नाम की कोई चीज़ नहीं होती, हम तो स्व पर उपकार करते हैं,
सामने वाला अपने पुण्य से अपना काम करा लेता है ।
(ऐसे ही अपकार नाम की कोई चीज़ नहीं होती, हम अपने पापोदय से अपना काम ख़राब करा लेते हैं, सामने वाले से/ सामने वाले को निमित्त बना कर)

अचानक ये पहाड़ी कैसे बन गयी,
पिछले 5-10 सालों में तो दिखती नहीं थी ?
यह दिल्ली के कूड़े का ढेर (गाजीपुर) है,
जो वातावरण के स्वच्छ होने से दिखने लगा है ।

Moral….
विचार स्वच्छ होने पर ही अपने मन की गंदगी दिखती है ।

चिंतन

और जैसे-जैसे मन की गंदगी कम होती जाती है, श्वेत(हिमालय की श्रंखला)/ शुद्धता द्रष्टिगोचर होती जाती है जैसा कमल जी ने अपनी टिप्पणी (नीचे) में चिंतन दिया है ।

इनमें चमत्कार नहीं सुने, चाहे मंदिर सोने/चांदी के ही क्यों न हों ।
कारण ?
1. घरों में इतनी पवित्रता नहीं रह सकती,
2. बहुत कम लोगों की भक्ति, इन मंदिरों से जुड़ पाती है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

The tendency to follow the path of least resistance guarantees failure in life.

इसीलिए भगवान महावीर ने महलों की आरामदायक जिंदगी छोड़ कर जंगलों का सबसे कठिन रास्ता चुना और सफलता प्राप्त कर मोक्ष पाया ।

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