पाप और पाप क्रिया को छोड़ना, व्रत है ;
पुण्य और पुण्य क्रिया को छोड़ना वैराग्य  ।

(मंजू)

अभाव दु:खदायी नहीं, अभाव की अनुभूति दु:ख देती है ।
सबसे ज्यादा अभाव में तो साधू रहते हैं, पर ना उनका अभाव उन्हें दु:खी करता है, ना औरों का सद्भाव,
बल्कि ये अभाव ही दूसरों पर प्रभाव ड़ालता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

शुद्ध वह जिसका मन शुद्ध हो,
और मन शुद्ध होता है परोपकार से ।
(परोपकार अपना भी ।
सिर्फ अपनों का नहीं, वह तो हिंसक पशु भी करते हैं)

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

पुण्योदय में संकट नहीं आते, पापोदय में यदि धर्म करें तो संकट टलेगा तो नहीं क्योंकि धर्म अन्याय नहीं होने देगा ।
पर भविष्य में पाप कर्म दुहराने की प्रवृत्ति समाप्त कर देता है ।

क्षु. श्री ध्यानसागर जी

आलाप –

  • कथन पद्धति
  • कम ना ज्यादा
  • कथन की स्पष्टता

वार्तालाप –

  • वार्तालाप में कोई सिद्धांत नहीं
  • आपस में आम बातचीत

आ. श्री विद्यासागर जी

“आ” से आनंद,
“श” से शिव/मुक्ति ।
“व” से विशुद्ध,
“द” से दया ।।

आशीर्वाद से नकारात्मता कम होती है, सकारात्मकता और आत्मविश्वास बढ़ता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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