धर्मानुराग – धर्म के प्रति ऐसा अनुराग जो विपत्ति में भी बना रहे ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
(अंधानुराग – अधर्म को भी धर्म का नाम देकर अनुराग/श्रद्धा सहित करना,
संसानुराग – आत्मा का अहित करनेे वाले संसारियों से अनुराग बनाये रखना)
कर्तृत्व (कर्ता) का भाव, कर्तव्य से विमुख कर देता है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
अ= नहीं, हम
जिसमें अपने को भूल जाय, उसे अह्म कहते हैं याने वह्म में रहना ।
बुराईयों में आकर्षण होता है,
बुरे लोगों के अचेतन मन में भय रहता है, इसलिये वे संगठित रहते हैं ।
अच्छों में प्राय: घमंड़ आ जाता है और जिनमें नहीं आता वे स्वाबलंबी होते हैं तथा मोक्षमार्ग पर अकेला ही चला जाता है ।
संस्कृति/सभ्यता आंतरिक, स्थायी, भारतीय चेतना को परिष्कृत करती है/जीवन को सुधारती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
लॉकर की दो चाबियाँ हैं, अमूल्य निधी दोनों के लगने पर ही मिलेगी ।
पुरुषार्थ की चाबी हमारे पास है, भाग्य की मैनेजर के पास ।
अपनी चाबी लगाते रहना, पता नहीं कब मैनेजर अपनी चाबी लगा दे ।
(धर्मेंद्र)

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
जल और मोह जहाँ गहरा होता है, बहाव उधर ही हो जाता है/वहीं ठहर जाता है, ठहरने से सड़ने लगता है ।
खुद का तथा जिससे मोह की तीव्रता होती है, दोनों का नुकसान करता है ।
चिंतन
महाराणा प्रताप ने जंगल में घास की चार रोटियाँ बनायीं, तीन कोई जानवर उठा ले गया ।
चौथी रोटी दान की थी, बच्चा तक भूखा रो रहा था पर दान की वह रोटी बच्चे को नहीं दी गयी ।
उसी समय भामाशाह ने अपार धनराशी लाकर राणा प्रताप को सौंप दी ।
इसे दान का प्रताप ना कहें तो क्या कहें !!
मुनि श्री सुधासागर जी
संसार में असंतुष्ट प्राणी वैराग्य लेने के बाद भी उन चीजों को पाने में लग जायेगा, जिनकी कमी वह संसार में अनुभव करता था ।
पर अनासक्त भाव दोनों क्षेत्रों में लाभकारी होता है ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
आज गुरुदेव का समाधि-दिवस है ।
जलेबी सिर्फ़ मीठी ही नहीं, एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है।
खुद कितने भी उलझे रहो, पर दूसरों को हमेशा मिठास दो ।
(नितिन-देहली)
You have ENEMIES ?
Good,
That means you’ve stood up for something, sometime in your life.
☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆
लेटे हुए बच्चे का तो डाकू भी दुश्मन नहीं होता !
5 छिद्रों वाले घड़े को कैसे भरेंगे ?
गुरु ने मुस्कान के साथ उत्तर दिया -पानी में ही डूबा रहने दो ;भरा ही रहेगा !
इसी तरह हमारी 5 इन्द्रियाँ परमात्मा में ही डूबी रहेंगी तो संसार क्या बिगाड़ लेगा !
तन की जाने, मन की जाने,
जाने चित की चोरी ।
(धर्मेन्द)

(दिव्या)
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