जोकर अपने आपको कलाकार मानता है, पर दुनिया जोकर ! ऐसा क्यों ?
क्योंकि उसका आचरण जोकर जैसा है ।
इसीलिये दुनिया को हंसाता है/दुनिया उस पर हंसती है, पर वह कभी नहीं हंस पाता ।

धन होने पर धनी कहलाते हैं, ज्ञान होने पर ज्ञानी !
पर ज्ञान तो कीड़े मकोड़ों को भी होता है ?
उनका ज्ञान गुजारे भर के लिये होता, जीवन निर्माण के लिये नहीं ।
पहले ज्ञानी बनो, फिर उसका चिंतन करो, तब अनुभूति होगी ।

मुनि श्री समयसागर जी

धर्मानुराग – धर्म के प्रति ऐसा अनुराग जो विपत्ति में भी बना रहे ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

(अंधानुराग – अधर्म को भी धर्म का नाम देकर अनुराग/श्रद्धा सहित करना,
संसानुराग – आत्मा का अहित करनेे वाले संसारियों से अनुराग बनाये रखना)

बुराईयों में आकर्षण होता है,
बुरे लोगों के अचेतन मन में भय रहता है, इसलिये वे संगठित रहते हैं ।

अच्छों में प्राय: घमंड़ आ जाता है और जिनमें नहीं आता वे स्वाबलंबी होते हैं तथा मोक्षमार्ग पर अकेला ही चला जाता है ।

लॉकर की दो चाबियाँ हैं, अमूल्य निधी दोनों के लगने पर ही मिलेगी ।
पुरुषार्थ की चाबी हमारे पास है, भाग्य की मैनेजर के पास ।
अपनी चाबी लगाते रहना, पता नहीं कब मैनेजर अपनी चाबी लगा दे ।

(धर्मेंद्र)

जल और मोह जहाँ गहरा होता है, बहाव उधर ही हो जाता है/वहीं ठहर जाता है, ठहरने से सड़ने लगता है ।
खुद का तथा जिससे मोह की तीव्रता होती है, दोनों का नुकसान करता है ।

चिंतन

महाराणा प्रताप ने जंगल में घास की चार रोटियाँ बनायीं, तीन कोई जानवर उठा ले गया ।
चौथी रोटी दान की थी, बच्चा तक भूखा रो रहा था पर दान की वह रोटी बच्चे को नहीं दी गयी ।
उसी समय भामाशाह ने अपार धनराशी लाकर राणा प्रताप को सौंप दी ।
इसे दान का प्रताप ना कहें तो क्या कहें !!

मुनि श्री सुधासागर जी

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