ये नर्म मिजा़जी ही है,
कि फूल कुछ नहीं कहते !..
वरना कभी दिखलाइये,
कांटों को मसलकर….!!
(मंजु)
ज्ञानी शरीर और आत्मा के भेद को जानता/मानता है,
उलझाता नहीं/सुलझाता है,बिखरे को समेटता है;
पर विद्वान नहीं ।
दोषों में छेद कर देना ।
बीमारी में कड़वी दवा दंड़ नहीं होती,
ऐसे ही प्रायश्चित , बीमारी अच्छी करने की विधि है ।
धर्म को विचार,
दर्शन को विश्वास,
और
आध्यात्म को आचरण कहते हैं ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
आग्रह, आशंका, आवेश और आसक्ति में लिये गये निर्णय सही नहीं होते ।
आटे से रोटी बनाना – उपयोग,
खुद और दूसरों को खिलाना – सदुपयोग,
बिगाड़ना – दुरुपयोग
बेहोशी में भी कुछ सत्य दिख सकता है पर गलत मान्यता वाले को/मोहित को सत्य भी असत्य दिखता है ।
हर कर्म पूजा नहीं होती ।
जो खटकर्म/दुष्कर्म से हटकर सत्कर्म किया जाता है, वह पूजा होती है ।
यूँ ही नहीं होतीं हाथ की लकीरों के आगे उँगलियाँ,
रब़ ने भी किस्मत से पहले महनत लिखी है ।
नौ द्वारन का पींजरा, तामै पंक्षी मौन !
रहत अचम्भा जानिये, जावत अचरज कौन !!
ज़िंदगी पर ड़ाल दी जिसने हकीकत की नज़र,
ज़िंदगी उसकी बेहकीकत हो गयी ।
वैभव का संग्रह पाप है, सदुपयोग पुण्य ।
सुविधाओं का अनियंत्रित उपयोग दुविधा बन जाती है ।
साइकिल चलाने से ज्यादा कठिन है, धीरे चलाना और सबसे कठिन है एक स्थान पर रोके रखना, इसके लिये बहुत प्रयास करना होता है ।
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