माईक की तरह नहीं सुनना, इधर सुना उधर बाहर ।

मुनि श्री निर्वेगसागर जी

बिना अनुमति दूसरे की चीज़ लेना चोरी,
पर बिना अनुमति, दूसरे की वस्तु के ग्रहण का, भाव भी नहीं करना, अचौर्य – धर्म ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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