चिंतामणी से जो माँगो, मिल जाता है ।
पर धर्म से तो बिना माँगे, सब कुछ मिल जाता है ।

इच्छाओं के निरोध का पहला कदम है – दूसरों से अपेक्षा कम करते हुए, समाप्त करना ।
सरल को पहले tackle करना/गरम खिचड़ी के बाहर वाली पहले खाना ।

यदि दूसरों से अपेक्षा रखी, तो उपेक्षा के लिए तैयार रहें ।

ग्रह/नक्षत्र ऊर्जा पिंड़ हैं ।
इनकी गति से वातावरण के अवयवों की Chemistry बदलती रहती है ।
हमारे शरीर में भी वे ही अवयव हैं, सो हम पर भी प्रभाव पड़ता तो है पर पुरुषार्थ और पुण्य ज़्यादा प्रभावक होते हैं ।

धर्म/संप्रदाय तो अलग अलग होंगे ही, क्योंकि विश्वास/संस्कार सबके अलग अलग होते हैं, उनको ऊपर उठाने में आपत्ति नहीं ।
पर दूसरे धर्मों को गिराना साम्प्रदायिकता है, अपराध है ।

ग्रहस्थ, क्रोध आदि पर नियंत्रण कैसे करें ?
कषाय आए तो आने दो,बाढ़ को रोको ।
बाढ़ याने अति/ किनारे (सीमा) टूटना ।
बाढ़ रोकने में स्वाध्याय व सुसंगति बहुत सहायक होते हैं ।

क्या शरीर को कष्ट देकर धर्म करना सही है ?
नहीं, धर्म से तो शारीरिक कष्ट सहने की शक्ति आती है ।
उस शक्ति को बढ़ाने के लिए, क्षमतानुसार शरीर को कष्ट देते हुए,समता-भाव पूर्वक धर्म-ध्यान करना चाहिए ।

जो अपने कार्य/कर्तव्य में डूब जाता है, वह उस कार्य/कर्तव्य से कभी ऊबता नहीं है ।
धर्म के क्षेत्र में तो नित नए आनंद का अनुभव होता रहता है सो ऊबने का तो प्रश्न ही नहीं, उल्टे उत्साह बढ़ता ही रहता है ।

एक समुदाय में ब्याज लेना गुनाह है, तो बाकीयों को लेना चाहिए ?
शोषण (सामान्य से ज़्यादा नहीं) नहीं, पोषण (जिसमें दोनों पक्षों का भला हो) हो तो ले सकते हैं ।

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April 8, 2022

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