क्षमा हमारा स्वभाव है ।
क्षमा शब्द “क्षम” धातु से बना है,
जिसका अर्थ है “सामर्थ्य” ।
जो जितना सामर्थ्यवान होगा, उसे उतना ही क्षमावान होना चाहिए ।
क्रोध शाँत करने के उपाय…
1) सकारात्मक सोचें
2) क्रोध में ईंधन न डालें
3) चुप रहें ।
गुरु मुनि श्री क्षमा सागर जी
हम पर 1 जनवरी का नववर्ष थोपा गया,
उस समय लोग विक्रमी संवत के अनुसार
1 अप्रैल से अपना नया साल मनाते थे,
आज भी हमारे बहीखाते और बैंक 31 मार्च को बंद होते हैं और 1 अप्रैल से शुरू होते हैं ।
जब भारत गुलाम था तो विक्रमी संवत का नाश करने के लिए साजिश करते हुए,
1 अप्रैल को मूर्खता दिवस “अप्रैल फूल” का नाम दे दिया ताकि हमारी सभ्यता मूर्खता लगे ।
याद रखो अप्रैल माह से जुड़े हुए ऐतिहासिक दिन और
त्यौहार…
1. हिन्दुओं का पावन महीना, इस दिन से शुरू होता है ।
(शुक्ल प्रतिपदा)
2. भारत के रीति-रिवाज, सब इस दिन के कलेण्डर
के अनुसार बनाये जाते हैं ।
एक महिला, जहाँ भी उँगली रखती, उसे ही कोसती क्योंकि उसकी उँगली में दर्द होने लगता था, उँगली में फ्रैक्चर था ।
तो, दर्द का कारण बाहर था या उसके अंदर ?
श्री रत्नसूरीश्वर जी
नियम इसलिये बने हैं ताकि हम बनें रह सकें….
लेकिन हो यह रहा है कि नियम तो बनते जा रहे हैं, लेकिन हम टूटते जा रहे हैं ।
गुरु मुनि श्री क्षमा सागर जी

(धर्मेंद्र)
जब वाणी मौन होती है,
तब मन बोलता है;
जब मन मौन होता है,
तब आत्मा बोलती है;
जब आत्मा मौन होती है,
तब परमात्मा से साक्षात्कार होता है..!
(ललित-ग्वालियर)
इसके पालन से विकृति से बचते हैं ।
जिस दूध के संस्कार कर दो वह दूध फटता नहीं/विकृत नहीं होता है ।
ज़िंदगी की
चादर पर
रोज़
एक छेद
हो जाता है…
ताकि
जीने वाला
झाँक कर देख सके
कि अब मौत
उसके
कितने क़रीब है….
पूज्य गुरु मुनि श्री क्षमा सागर
2 प्रकार –
- आराध्य – जो की पूज्यता के दायरे में आते हैं ।
- इष्ट – जिनकी नित्य पूजा करते हैं ।
संकट के समय इनका सहारा बहुत महत्त्वपूर्ण है ।
प्राय: धार्मिक जन पाप-पुण्य/नरक-स्वर्ग की बातें करते हैं ।
ज्ञानी, पाप-पुण्य से परे, मुक्ति की ।
मुनि श्री सौम्यसागर जी
इन दोनों में महत्त्वपूर्ण कौन ?
गुरू पर Attack करने वाले से बचाने वाला युद्ध करता है – क्रिया दोनों Same, पर भाव अलग अलग;
सो एक को पुण्य, दूसरे को पाप ।
ज़ुबान यदि कठोर बोलने के लिये बनी होती,
तो नियति उसमें हड्डी तो ड़ाल देती ।
भगवान/गुरु का कहा कर ना पाओ तो ना सही,
कम से कम वो तो मत करो, जिसकी उन्होंने मनाही की है (जिसे उन्होंने पाप कहा है) ।
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