संसार मुझ से नहीं चल रहा है, सबसे चल रहा है ।
मेरे कम होते ही उस जगह को भरने, दूसरा आ जायेगा ।
श्रद्धा मानने का विषय,
श्रद्धेय जानने का ।
दोनों सच्चे हों, तो अदभुत परिणाम ।
व्यथा में सुख की नहीं, शान्ति की तलाश रहती है ।
सुख की खोज तो अंतहीन है (जैसे ही व्यथा समाप्त हुई, फिर से सुख की खोज में लग जाते हैं) ।
क्षु. श्री ध्यानसागर जी
जहाँ चार चीज़ों की शुद्धता रखी जाये (द्रव्य, क्षेत्र, भाव और काल) ।
बदबू आने पर खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं/ नाक बंद कर लेते हैं ।
अपशब्द सुनने पर कान की खिड़कियाँ क्यों नहीं बंद कर लें ?
चकाचौंध से बचने के लिये लक्ष्य निर्धारित करके सुसंगति करें ।
जैसे नट रस्सी पर चलता है ।
परखो… तो कोई अपना नहीं,
समझो… तो कोई पराया नहीं ।
(ललित-ग्वालियर)
दिन
कब बीते हैं…
सिर्फ हम बीत जाते हैं ।
घड़े फूटे भर हों
स्वयं रीत जाते हैं….
ऐलक श्री सम्यक्त्वसागर जी
यदि अच्छे बन नहीं सकते,
तो कम से कम,
अच्छे दिखिये ।
ताकि आप को देख कर दूसरे तो अच्छे बनें ।
ज़िंदगी में कभी-कभी लोग
“बेहतर” की तलाश में
“बेहतरीन” को खो देते हैं ।
किसी की अंतिम यात्रा में जाओ तो यह मत समझना कि आप उसे उसकी मंज़िल पर ले जा रहे हैं…
बल्कि ,
यह समझना कि अर्थी पर लेटा इंसान…
मुर्दा होकर भी तुम्हें तुम्हारी मंज़िल दिखाने ले जा रहा है ।
(मंजू)
No matter how many times the teeth bites the tongue, they still stay together in one mouth. That is the spirit of FORGIVENESS.
Even though the two eyes don’t see each other, they see things together, blink simultaneously and cry together. That is UNITY.
(Pranjal)
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