उम्मीदों से बंधा एक ज़िद्दी परिंदा है इनसान ,
जो घायल भी उम्मीदों से है,
और
ज़िंदा भी उम्मीदों पर है ।

(मंजू)

हरिवंशराय बच्चन जी की एक ख़ूबसूरत कविता,

“रब” ने नवाज़ा हमें ज़िंदगी देकर,
और हम “शौहरत” माँगते रह गये ।
ज़िंदगी गुज़ार दी शौहरत के पीछे,
फिर जीने की “मोहलत” माँगते रह गये ।।

2) ये समुंदर भी दुनिया की तरह खुदगर्ज़ निकला,
ज़िंदा थे तो तैरने न दिया मर गए तो डूबने न दिया

3) जो सामने है उसे लोग बुरा कहते हैं,
जिसको देखा नहीं उसे सब “ख़ुदा” कहते हैं ।

(सुरेश)

भगवान, गुरु, शास्त्रों से;
माँ और बड़ों से, उनके बताये हुए मार्ग पर न चल पाने के लिये;
अपने आप से, जीवन सही तरीके से न जी पाने के लिये;
संसार के सब जीवों से, जाने/अनजाने में हुई ग़लतीयों के लिये;
क्षमा भाव ।

2) रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार,
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार ।

(ब्र.निलेश भय्या)

3) दिल में बसी नफ़रत को मिटा देना भी,
एक स्वच्छता अभियान है ।

(आर.के.गुप्ता)

आत्मा में रमना ही सच्चा ब्रम्हचर्य है ।

प्रवचन पर्व (आ.श्री विद्या सा.जी)

2) बेटे और पति के शरीरों पर हाथ रखने से जब एकसा महसूस हो तब पूर्ण ब्रम्हचर्य मानें ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमा सा.जी

“यह मेरा है”
ऐसे भाव का त्याग करना ही आकिंचन्य धर्म है ।

2) मछली पानी के बाहर आने पर मरने का एक कारण आक्सीजन की अत्यधिक मात्रा भी होती है, मनुष्य भी शुध्द आक्सीजन नहीं ले सकता ।

वैभव की अधिकता भी हमारे लिये ऐसा ही कारण बन जाती है ।

मोह को छोड़कर संसार, देह और भोगों से उदासीन परिणाम रखना त्याग धर्म है ।

बारसाणुवेक्खा-78

2) दान और त्याग में अंतर –
* दान प्रवृत्ति है , त्याग निवृत्ति  ।
* दान शुभ भाव है, त्याग शुद्ध भाव ।
* दान स्वर्ग का कारण है, त्याग मोक्ष का कारण ।
* दान साधन है, त्याग साधना  ।
* दान बहिरंग है, त्याग अंतरंग  ।
* दान असमझ पूर्वक हो सकता है किन्तु त्याग समझ पूर्वक ही होता है ।
* दान आंशिक दिया जाता है, त्याग पूर्ण का होता है ।
* दान श्रावक करता है, त्याग मुनियों के द्वारा  ।

मन,वचन,काय का सदुपयोग ही संयम है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

2) एक बड़ा ही शरारती बच्चा था। उसे दिन-भर खेलना , टी वी देखना और बढ़िया खाना, पीना ही पसंद था । उसकी माँ उसे बहुत समझाती, पर वह कभी न सुनता।
एक बार उनके घर के सामने से एक पुलिस अधिकारी एक कैदी को लेकर निकला। दोनों के साथ 5-5 सैनिक चल रहे थे, लेकिन जहाँ पुलिस अधिकारी के पांचों सैनिक उसके पीछे चल रहे थे और उसके सभी आदेशों का पालन कर रहे थे, वहीं कैदी को उन पाँचों सैनिकों के पीछे चलना पड़ रहा था और उनके आदेशों का पालन करना पड़ रहा था।
माँ ने बेटे को यह सब दिखाकर पूछा – बताओ , तुम इन दोनों में से क्या बनना चाहते हो ! पुलिस अधिकारी या कैदी ?
बेटे ने कहा- बेशक, मैं पुलिस अधिकारी बनना चाहुँगा।
तब माँ ने उसे समझाते हुए कहा-फिर तो तुम्हें अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण करना पड़ेगा , तभी तो ये तुम्हारी बात मानेंगी , तुम्हारे पीछे चलेंगी और यदि तुमने इन्हें नियंत्रण करना नहीं सीखा तो तुम्हें इनकी बात माननी पड़ेगी , इनके पीछे दौड़ना पड़ेगा और तब तुम अपने मन और इन्द्रियों के कैदी मात्र बनकर रह जाओगे।

कहते हैं “सत्य कड़वा होता है”,
पर वास्तविकता यह है कि सत्य कड़वा हो ही नहीं सकता ।
यदि कड़वा होता तो भगवान तो सदैव असत्य-वचन ही बोलते क्योंकि भगवान कभी कड़वे वचन बोल ही नहीं सकते और उन्होंने तो सत्य के अलावा कुछ बोला ही नहीं !
सचाई यह है कि हम सत्य को कलुषता के लिफाफे में रख कर pass-on करते हैं ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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