पवित्रता,
जो लोभ के अभाव में/संतोष से आती है,
और
शरीर की पवित्रता, गुणों से/तप से आती है ।

2) एक कंजूस सेठ गड्ढ़े में गिर गया । लोग उसे ऊपर खींचने के लिये, उसका हाथ माँग रहे थे पर वह हाथ नहीं दे रहा था, बस “बाहर निकालो” की रट लगाये जा रहा था ।
उसको जानने वाला एक व्यत्ति आया, उसने सेठ से हाथ माँगा तो सेठ ने तुरंत हाथ दे दिया और सेठ को बाहर खींच लिया गया ।

जिसने कभी किसी को कुछ भी न दिआ हो,
वह अपनी जान बचाने के लिये भी अपना हाथ भी नहीं दे सकता ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

मायाचारी का अभाव ।

2) ईमानदारी, उन्मुत्त हृदय, स्पष्टवादिता, सादगी, भोलापन, सरलता ही आर्जव धर्म है ।

ईमानदारी की नाव पर तो हम सब सवारी कर रहे हैं पर उसमें बेईमानी के अनेकों छेद हैं,
जिन्हें सफेद/स्वच्छ कपड़े से ढके रहते हैं ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

3) जोकर तो एक मुखौटा पहनता है,
जो सबको दिखता है,
पर हम तो अनेकों मुखौटे पहनते हैं और किसी को दिखने भी नहीं देते ।

4) दोहरा जीवन जीने वाले, दोहरे stress में रहते हैं ।

“म”  से मान का
“द” से दमन,
“व” से विनम्रता द्वारा ।

2) मार्दव धर्म का प्रारम्भ होगा…
भगवान के सम्मान / गुणगान से,
फिर गुरु / शास्त्र तथा माता पिता के से,
इनके प्रति कृतज्ञता का भाव बनाये रखने से ।
और अंत में छोटों को सम्मान देने से ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

3) मान त्रिकोणा घेरा है जो तीनों से मिलने नहीं देता…
* भगवान से
* संसार से
* अपने आप से भी ।

4) आसमां पे ठिकाने किसी के नहीं होते,
जो जमीं के नहीं होते वो कहीं के नहीं होते..

5) झूठी शान के परिंदे ही ज्यादा फड़फड़ाते हैं …
बाज़ की उड़ान में कभी आवाज़ नहीं होती ।

 

1) क्रोध आने के कारण…
* मनोवृत्ति
* आसक्ति
* अपेक्षा

गुरवर श्री क्षमासागर जी

2) क्रोध पर क्रोध करने से क्रोध कम नहीं होगा,
क्षमा रूपी दीपक के प्रकाश में क्रोध का अंधकार पास नहीं आ पायेगा ।

पूरी जिंदगी हम इसी बात में गुजार देते हैं कि……. “चार लोग क्या कहेंगे”,
और अंत में चार लोग बस यही कहते हैं कि…. “अरिहंत नाम सत्य है / राम नाम सत्य है” ।

(नीलांजना)

“बुराई ” करना रोमिंग की तरह है,
बोलो तो भी चार्ज लगता है और सुनो तो
भी ।

“नेकी” करना LIC की तरह है,
ज़िंदगी के साथ भी,
ज़िंदगी के बाद भी ।

तो “धर्म” की प्रीमियम भरते रहो
और अच्छे कर्म का “बोनस” पाते रहो……।

(अपूर्व श्री)

पराश्रित सुख से उत्तम स्वाश्रित दुःख है,
तभी तो साधु विषय-सुखों का त्याग करके तप के दुःख को अंगीकार करके सुखी रहते हैं।

क्षु.श्री ध्यान सा.जी

स्वर्ण कितना भी मूल्यवान क्यों ना हो,
किन्तु सुगंधि पुष्प से ही आती है ।
हालाँकि श्रृंगार के लिये दोनों का ही महत्त्व है ।

इसी तरह ज्ञान कितना भी मूल्यवान क्यों ना हो;
किंतु,
उसकी सुगंधि, बिना आचरण के नहीं आ सकती ।

(मंजू)

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