अपने मन रूपी खेत में दूसरों के प्रति वैमनस्य रूपी विष बीज ड़ालेंगे तो फसल तो विष रूप ही होगी ना !
भोगनी तो तुम्हें ही पड़ेगी ना !
चिंतन
घड़ी की टिक-टिक को
मामूली न समझो !
बस यूँ समझ लीजिये…
” ज़िंदगी ” के पेड़ पर
ये समय रूपी कुल्हाड़ी
के वार हैं !!
बारिश की बूँदें, भले ही छोटी हों, लेकिन उनका लगातार बरसना बड़ी बड़ी नदियों का बहाव बन जाता है.
ऎसे ही हमारे छोटे छोटे और अच्छे प्रयास निश्चित ही ज़िंदगी में बड़ा परिवर्तन लाने में सक्षम होते हैं ।
(अभिषेक-ग्वालियर)
इस मार्च एन्डिंग में, जीवन की बैलेंस शीट जांचने की इच्छा हुई,
तो पाया कि प्रेम,स्नेह,आत्मीयता,भाईचारा और कर्तव्यनिष्ठा के खाते ही गायब हैं।
मन के ‘मुनीम’से पूछा तो वो बोला –
सर जी, वर्षो से इनके साथ कोई लेनदेन हुआ ही नहीं।
ना जाने कितने रिश्ते ख़त्म कर दिये इस भ्रम ने-
कि मैं ही सही हूँ,
और सिर्फ़ मैं ही सही हूँ….!!
पूजा श्रद्धा का विषय है, सेवा संवेदना का ।
श्रद्धा के साथ संवेदना और प्रबल व श्रेष्ठ हो जाती है ।
लौकिक दान जीवन निर्वाह के लिये ।
अलौकिक, जीवन निर्माण के लिये ।
सम से सम्पदा बना,
यानि अपने और दूसरों के माध्यम से अर्जित की जाती है ।
अत: इसका उपयोग भी दोनों के लिये होना चाहिये ।
किस रूप का चिंतन करें ?
अपने उस रूप का, जो तुम किसी के सामने प्रस्तुत नहीं करते हो/बिना मुखौटे वाला ।
बदलावों से नयी अनुभूतियाँ होती हैं ।
भीतर के बदलाव के लिये बाह्य का परिवर्तन जरूरी है ।
भाव बनाने के लिये शादी, सेना, पूजा के लिये पोशाक निर्धारित की गयी है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Easier to do,
is harder to change.
इंसान भी कैसा अजीव है …!
जीते समय सोचता है कि कभी मरुँगा नहीं,
मरते समय लगता है जैसे कभी जीया ही नहीं ।
(सुरेश)
मुहूर्त तो शादी (फंसने) के लिये देखा जाता है, तलाक (निकलने) के लिये नहीं ।
मुनि श्री कुंथुसागर जी

1) हो-ली…जो बीत गयी सो बात गयी।
2) हो-ली…मैं धर्म की हो-ली।
3) Holy…Purity.
(Neelam)
एक ही सिक्के के दो पहलू हैं…
प्रसन्नता और सम्पन्नता ।
संसार/पाश्चात्य में संपन्नता को प्रमुखता,
धर्म/पूर्व में प्रसन्नता को ।
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