पहले तात्कालिक लाभ को प्राथमिकता पर दीर्घकालीन ज्यादा महत्वपूर्ण।
मंदिर आदि में (बोलियाँ आदि लेना) चार प्रकार के दानों के अलावा, धर्म प्रभावना के लिए “धर्मदान” में आयेगा।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 4-4-22)
धर्म जीने की कला सिखाता है, साथ साथ मरने का सलीका भी।
जैसे एक ही थाली से खाया भी जाता है, त्याग भी।
आर्यिका अर्हम् श्री माताजी
जब तन साथ नहीं जाता तो सन (Son) कैसे जायेगा !
पति नहीं जायेगा पर पाप ज़रूर साथ जायेगा।
चिंतन
अस्वस्थ होते हुए भी हम स्वस्थ हैं, ऐसी धारणा बनाने से समता आयेगी।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
दान देने में भी आनंद तभी आता है जब आप स्वाधीन हों,
जैसे भिखारी को खिलाते समय कोई प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं सो खिलाने में आनंद आता है, मेहमान आदि को खिलाते समय हमारी खुशी प्रतिक्रिया के अधीन होती है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 6 जुलाई)
जैसे जैसे पैसा बढ़ता जाता है शून्यता बढ़ती जाती है –> 10, 100, 1000….।
इसलिये बुजुर्गों ने 11, 101, 1001, देने का रिवाज बनाता था। ताकि रिश्तों में एक-ता बढ़े, शून्यता नहीं।
धर्मेन्द्र (चिंतन)
संसार की एक उपयोगिता यह भी है कि यहाँ सुख का Taste/ पहचान हो जाती है (सुखाभास के रूप में)। तभी तो असली/ Permanent/ अनन्त सुख की अभिलाषा जाग्रत हो जाती है/ चेष्टा करने का मन होने लगता है।
चिंतन
कर्तृत्व, भोक्तृत्व तथा स्वामित्व भावों से बुद्धि भ्रष्ट होती है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Lack of confidence के कारण ?
हो पायेगा (भविष्य का भय) !
या
हो गया था (भूत के दुखद अनुभव)
यही हमारी गाथा है, आत्मविश्वास का खाका है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 17 मई)
धैर्य, क्षमतानुसार पुरुषार्थ करके बिना विकल्प के फल का इंतज़ार करना।
क्षमतानुसार पुरुषार्थ न करके फल का इंतज़ार करना, आलस होता है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
सब दान त्याग हैं।
पर सब त्याग दान नहीं।
पीयूष दोषी जैन
आचार्य श्री विद्यासागर जी से किसी गृहस्थ ने कहा… हम तो श्रावक हैं, आपके दर्शन करते समय भी कुछ अपेक्षाएं रखते हैं। पर आपकी निरीहता हमको अपनी उपेक्षा लगती है। हमको सीख कैसे मिलेगी ?
आचार्य श्री…
जो सीख चुका है, उसे सिखाने का भाव नहीं,
अपना ध्यान ही, अपनों का ध्यान है,
सिखाने से ज्यादा, दिखाने से सीखता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 15 मई)
अज्ञानी बच्चे हाथी के आगे-आगे चलते हैं (हाथी जो ज्ञान का प्रतीक है और अज्ञानी बच्चे मान के)। वही बच्चे पागल के पीछे-पीछे ताकि उसे पत्थर मार सकें।
इसीलिए आचार्य भगवन कहते हैं… ज्ञान वही जो गर्व रहित हो।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (आचार्य श्री अमोघवर्ष – गाथा 27 – 14 मई)
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… झूठ यदि सफ़ेद हो सकता है तो सत्य को कड़वा कहने में क्या दुविधा !
पर सत्य होता है बर्फ़ जैसा, अग्नि पर रखने पर भी वह गर्म नहीं होता, वह अपना सत्यपना नहीं छोड़ता।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 12 मई)
Pages
CATEGORIES
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत – अन्य
- प्रश्न-उत्तर
- पहला कदम
- डायरी
- चिंतन
- आध्यात्मिक भजन
- अगला-कदम
Categories
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- Uncategorized
- अगला-कदम
- आध्यात्मिक भजन
- गुरु
- गुरु
- चिंतन
- डायरी
- पहला कदम
- प्रश्न-उत्तर
- वचनामृत – अन्य
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
Recent Comments