यदि पर की ओर देखना ही है तो “पर की आत्मा” की ओर क्यों न देखें!
ताकि आप परमात्मा बन सकें।
चिंतन
अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण सत्ता के बारे में एक पुस्तक लिखी गई, नाम था “सोने की चिड़िया और लुटेरे अंग्रेज”। आचार्य श्री विद्यासागर जी उस पुस्तक का पूरा नाम नहीं लेते थे। अगर वह पुस्तक मंगानी होती थी तो कहते थे… सोने की चिड़िया वाली पुस्तक ले आओ।
बोलते समय इतना ध्यान रखते थे कि कठोर शब्द मुंह से न निकल जाय।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रश्नोत्तर रत्नमाला- गाथा 23 – 9 मई)
एकांत यानी एक का भी अंत।
(रेनु – नया बाज़ार)

(Ekta- Pune)
उदासीनता से न तो संसार चलता है, न ही परमार्थ।
जब इनमें उत्साह रहता है, तब दोनों उत्सव बन जाते हैं।
मुनि श्री सौरभसागर जी
आषाढ़ के माह में (जो आजकल चल रहा है) नमी बहुत होती है, त्वचा के रोमों से वायु के साथ* नमी अंदर भी चली जाती है। उससे जठराग्नि मंद पड़ जाती है।
नतीजा ! दर्द, जकड़न,वायु, किडनी संबंधित रोग। क्योंकि जठराग्नि कम होने से भोजन पचता नहीं पर हम अज्ञानतावश पूरा खाना चाहते हैं, भूख जागृत करने के लिए चाट पकोड़ी खाने लगते हैं।
नतीजा ! पेट में वायरस/ बैक्टीरिया और वायु पैदा होने लगती है। इसीलिए आयुर्वेद में कहा है… इस माह में शारीरिक परिश्रम ज्यादा जैसे मुनिराज लंबे-लंबे विहार करते हैं और व्रत उपवास करने चाहिए।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 24 जून)
* सर्दियों में तो पंखे चलते ही नहीं, गर्मियों में गर्म हवा देने लगते हैं इसलिए कम स्पीड पर चलते हैं।
साइकिल पैडल मारने पर चलती है। लेकिन ढलान पर बिना पैडल मारे भी!
क्योंकि पहले काफी पैडल मारकर अच्छी गति प्राप्त कर ली थी।
ढलान भी पूर्व के पुण्योदय से प्राप्त होती है।
पापी ने भी पूर्व में बहुत पुण्य कमाया जो आज बगैर पुण्य किए सुख भोग रहा है।
मुनि श्री विनम्रसागर जी
कहा है कि संसार को देखकर वैराग्य होता है पर हमको हो क्यों नहीं रहा ?
क्योंकि हम संसार में रूप देखते हैं जिससे राग बढ़ता है, उसका स्वरूप नहीं देखते।
वैराग्य की चिनगारी उठती तो है पर उसे लगातार ईंधन नहीं मिलता, इसलिए बुझ जाती है। सत्संग/ गुरु का सान्निध्य मिलता रहे तो वैराग्य भी बना रह सकता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड – 9 मई)
दूध जितना फटता है (दूध से दही, मक्खन, घी आदि) उतनी कीमत बढ़ती है।
हम जितना फटते हैं उतनी कीमत घटती है।
मुनि श्री विनम्रसागर जी
पाँच प्रकार के पापों का फल उत्तरोत्तर अधिक-अधिक है-
हिंसा से ज्यादा झूठ का क्योंकि इसमें हिंसा भी आ जाती है।
ऐसे ही चोरी, कुशील, परिग्रह।
यानी परिग्रह सबसे बड़ा तथा इसमें पाँचों पाप समाहित हैं।
मुनि श्री विनम्रसागर जी

(Aruna)
क्रोध प्रीति को नष्ट करता है।
मान, विनय को।
माया, मैत्री,
लोभ, सर्व विनाशक है।
क्षुल्लक श्री जिनेंद्रवर्णी जी (शांतिपथ प्रदर्शक)
हर क्षेत्र में Best Performance अबुद्धिपूर्वक ही होता है जैसे वाद्य बजाते समय।
शांतिपथ प्रदर्शक
क्योंकि जब बुद्धि विश्राम करती है तब आत्मा Takeover कर लेती है। तब Best ही होगा न!
चिंतन
विचार कर्मों पर आधारित या पुरुषार्थ पर ?
दोनों के संयोग से।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – 23)
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