बच्चा माता पिता के बीच सो रहा है, सर्वाधिक सुरक्षित महसूस करता है। स्वप्न में शेर उसे खाने आया।
बचाएगा कौन ?
कोई संबंधी नहीं। सिर्फ़ जगना ही बचा सकता है।

चिंतन

राजा के प्रिय मंत्री की गलती पर राजा को सजा तो देनी ही थी।
सैनापति की राय थी – 1 लाख मुद्रा 100 कोड़े, सैनिक की 1 हजार मुद्रा 10 कोड़े, भिखारी की 10 मुद्रा , 1 दिन भोजन नहीं।
सबके अपनी बुद्धि/स्तर के अनुसार मापदंड थे।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

क्या भगवान भक्तों की ही इच्छा-पूर्ति करते हैं, या जो भी शरण में आता है, उसकी?
भगवान किसी की भी इच्छा-पूर्ति नहीं करते। जो भी विश्वास के साथ उनकी शरण में जाता है, उसकी इच्छाएँ ही समाप्त हो जाती हैं।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सामने वाले में अच्छाई दिखे तो उसे सच्चाई मानो (भरोसा, परखकर)।
अपनी अच्छाई के पीछे सच्चाई परखो।
परिवार/ समाज में सच्चाई को गौण कर अच्छाई को प्रमुखता दें।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

आकांक्षा का नुक़सान… संसार तथा परमार्थ दोनों में फल पर दृष्टि रहती है सो धर्म/ कर्तव्य पर कम हो जाती है।
इससे विशुद्धि/ शांति भी कम हो जाती है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र 7/23)

रुलाना….
किसी को रुलाने का पाकीज़ा तरीका… हँसाओ इस क़दर कि पानी निकल आये,
हम तो दुश्मन को भी पाकीज़ा सज़ा देते हैं।
हाथ उठाते नहीं, नज़रों से गिरा देते हैं।

डॉ. ब्र. नीलेश भैया

मन्दिर जाना बन्द कर दिया क्योंकि वहाँ झगड़े/ विसंवाद होते हैं।
दुकान/ घर में भी तो होते हैं, वहाँ जाना/ रहना बन्द किया क्या?

मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

सिद्धि के लिए साधना होती है।
लेकिन इसके आगे यदि “प्र” लग गया तो साधना प्रसिद्धि के लिए होने लग जाती है, सिद्धि छूट जाती है

आचार्य श्री विद्यासागर जी

नया व्यक्ति गाँव में पहुँचा।
पूछा –> यहाँ के लोग कैसे हैं ?
मैं ही ईमानदार हूँ (पूरे गाँव के बारे में कथन हो गया)।
दूसरे से पूछा –>
मैं भी ईमानदार हूँ (इसमें भी पूरा कथन हो गया)।

पहले वक्तव्य में घमण्ड, दूसरे में विनम्रता। फ़र्क सिर्फ़ “ही” और “भी” का है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ/ दिमाग शिथिल हो जाते हैं। जिन चीज़ों में पहले से रुचि है वही आगे बढ़ जातीं हैं।
यदि खाने में तो खाते रहते, पूजा-पाठ तो वह बढ़ जाता है।

इसलिए शुरु से ही संस्कार अच्छे/ धार्मिक डालें।

चिंतन

अकेला कोई रहना नहीं चाहता।
दो होते ही… तीन…चार।
तालाब में पत्थर फेंकते ही एक, फिर अनेक लहरें उठ जाती हैं।
ऐसे ही विचार एक के बाद अनेक आने लग जाते हैं।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

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