1) Urgent and Important……………. Do it.
2) Not Urgent but Important………..Delay.
3) Urgent but not Important…………Delegate.
4) Not Urgent and Not Important….Delete.

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 8 जून)

प्राय: दूसरों से अधिक से अधिक सुख लेना चाहते हैं। जैसे मिठाई मेरी थाली में है पर Common में से पहले और ज्यादा से ज्यादा लेना पसंद करते हैं/ लेते हैं।
अनात्मा की ओर ही लगे रहते हैं इसीलिये अपनी आत्मा की ओर आ नहीं पाते।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

प्रॉब्लम कंप्रोमाइज क्यों नहीं हो रही ?
कारण ?
एनालाइज नहीं किया, यदि एनालाइज किया भी था तो रियलाइज़ नहीं किया होगा। अगला कदम एक्सरसाइज, फिर भी कंप्रोमाइज नहीं हो रही तो मिनिमाइज हो ही जाएगी, जो अभी तक क्रिटिसाइज़ की जा रही थी।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 3 जून)

मेहमान ने 8 पूड़ी खाने के बाद बोला – बस! अब रहने दो, 8 पूड़ी हो गयीं।
मेजबान – वैसे तो 12 हो गयीं पर गिनता कौन है! और लें।
हमारा उपयोग ऐसा तो नहीं?

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

ध्यान आदि शुभ काम करते समय अशुभ भाव क्यों आते हैं और उनको दूर कैसे किया जा सकता है ?
पूरा समय मीठा खाने के साथ यदि कुछ खट्टा खा लिया तो डकार खट्टी आती है। ऐसे ही दैनिक जीवन के कामों में आये अशुभ भाव शुभ पर भारी पड़ जाते हैं।
समाधान… खट्टा खाना/ विकारी भावों से दूर रहें।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 3 जून)

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…
बांध-बांध कर क्यों रखना !
जब ख़ुद को बंध कर जाना ही है।
अर्थी पर भी, कर्मों से भी बँध कर।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

एक खगोलविद सड़क पर चलते-चलते तारों को देखे जा रहा था।
खुले गटर में गिर गया।
आसमानी संभावनाओं / ज्ञान से पहले ज़मीनी हक़ीक़तों को जानना जरूरी होता है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

शिविर में हम कितने धार्मिक हैं उससे ज्यादा ज्ञान यह प्राप्त किया होगा कि हम कितने अधार्मिक थे।
धीरे-धीरे शिविर की सीखें कम होंगी पर कुछ को पकड़ कर रखना होगा। उसके लिए जरूरी है सजग/ सतर्क रहना।
देखना होगा कि सुविधाओं के छोड़कर सुकून ज्यादा था या लौट कर उनको भोगने में। यह रियलाइज़ करने के बाद एनालाइज करें और एक्सरसाइज करें।
धार्मिक क्रियाओं में संजीदगी को बढ़ाना होगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस/ जिंदगी से दूर रहकर अपना आत्मविश्वास बनाए रखना होगा; परजीवी बन कर न रह जाएँ।
भगवान ना सही गुणवान बनें, गुणवान बनने के लिए गुणगान करना होगा/ गुणों का ध्यान और अज्ञान का ज्ञान आवश्यक है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 8 सितम्बर)

जीवन विकास के 10 दिवसीय शिविर के समापन पर संबोधन करते हुए कहा… व्यवस्थाएं चुस्त भी, सुस्त भी रहीं पर कुल मिलाकर मस्त रहीं।
अपने को अनाड़ी खिलाड़ी बताते हुए, जिसने ना कोचिंग ली, ना पहले प्रैक्टिस ली,पर अपने सबके विकास के पीछे एक नेपथ्य नायक हैं जो पर्दे के पीछे से सब कुछ संभाल रहे थे जैसे कठपुतली को नाचते समय पीछे कलाकार होता है और उनका नाम है आचार्य श्री विद्यासागर जी।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 7 सितम्बर)

जो आत्मा में विचरण करता, वह इंद्रियों के विचलन से बचता। इंद्रियों की दासता समाप्त होते ही आत्मा में विचरण शुरू हो जाता।
देर तक जगने वाले(समय माफिया) के विचार, विकारों में परिवर्तित होने लगते हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी के हजारों ब्रह्मचारियों देखकर एक वैज्ञानिक दल ने कहा कि ब्रह्मचर्य संभव ही नहीं और यदि है भी तो उन्होंने दवाओं से अपने विकारों को दबा दिया होगा। उत्तर देते हुए कहा… हाँ दवा तो लेते हैं पर आचार्य विद्यासागर की अध्यात्म और वैराग्य की औषधि।
जो विकारों से हार जाते वही हार्मोन्स की बात करते। 10,10 उपवास करने वालों से पूछो, क्या उनकी भूख 3 दिनों के बाद दवाओं से दब गई थी ?

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 6 सितम्बर)

“कुछ भी मेरा नहीं” होने के भाव को ही आकिंचन्य कहते हैं। हल्का होना ऊपर उठना सिखाता है, बाह्य तथा अंतरंग धारणाओं से भी।
एक व्यक्ति समुद्र के रास्ते व्यापार करके बहुत सोना लेकर वापस आ रहा था। रास्ते में तूफान आया और उसने अपनी जान बचाने के लिए सारा सोना समुद्र में फेंक दिया। स्वर्ण से तो रीत गया पर आयु रीत नहीं पाई।
आज शिक्षक दिवस भी है। शिक्षा वही जो मुक्ति में सहायक हो और मुक्ति के लिए रीतना भी ज़रूरी है। आज की शिक्षा कलेक्शन ऑफ़ इनफार्मेशन है जबकि होना चाहिए था करेक्शन ऑफ़ इनफॉरमेशन और उसके लिए जरूरी है कनेक्शन होना।
आज का नियम था दृष्टि संयम,आई कांटेक्ट से बचना यानी नज़रें झुका कर रखना जो कोमलता प्रदान करता है और कर्म के कांटेक्ट से बचाता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 5 सितम्बर)

राग धूप है तथा त्याग छाँव। त्याग तो अवश्यम्भावी है,स्ववश किया तो आनंद परवश किया तो छटपटाहट। आचार्य ज्ञान सागर बताते थे… जो त्याग परवश किया जाता है वह उल्टी जैसा है, परेशानी देने वाला और स्ववश जैसे दैनिक क्रिया में, वह सुकून देने वाला।
आज शिविरार्थियों को नियम दिया है… सब तरह के रसों का त्याग, नीरस उबला भोजन करने का, उससे ही वस्तु का असली स्वाद आता है। यदि उसको 32 बार चर्वण करके खाया जाए तो मिष्ठान से भी ज्यादा स्वाद आता है। जिव्हा पर रखा हुआ नियंत्रण, जीवन पर नियंत्रण बन जाता है। सामने वाला बांधेगा तो बंधन,‌ दबाव/ असहजता लगेगी। स्वयं तो संयम, भावों में निर्मलता आती है। हीरा ऊपर का त्याग करता है तो चमकदार कीमती बन जाता है।
कभी भाव आया कि हम किसी बुराई का त्याग करें और करने पर यदि आनंद आया तो सोचा कि कोई और बड़ी बुराइयों का करें !

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 4 सितम्बर)

कर्मों को क्षय करने के लिए जो किया जाए उसे तप कहते हैं।
गृहस्थों के लिए आजकल एक बड़ा तप है… सुबह जल्दी उठना। निशाचर कोई राक्षस नहीं होता। जो रात को देर तक जागता है, वह होता है। ज्योतिष शास्त्र में रात्रि के प्रहरों को राक्षस, निशाचरयोग, रुद्रकाल जैसे नाम दिए गए हैं। जो रात को देर तक जागते हैं उनका झुकाव व्यसनों की तरफ जल्दी होता है, प्रकृति के विपरीत विकृति में रहते हैं।
रात को कुछ एकाग्रता वाला काम करना है तो 2:00 बजे तक जगने की जगह 2:00 बजे उठकर क्यों नहीं कर सकते !
पहले तप का नाम है प्रायश्चित। गुरु के सामने ना कर पाओ तो कम से कम लिख लो, बाहर तो निकलेगा।
जीवन का विकास तभी शुरू होगा जब आप अपने आप को एक दिन में वचनों से तीन बार और मन से हर समय अधार्मिक और अज्ञानी मानेंगे।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 3 सितम्बर)

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