कारण परमात्मा…. बीज/ संसार/ बिंदु। इसलिये संसार भी आदरणीय, यहाँ तक पेड़ादि भी क्योंकि वे मनुष्य की वंशवृद्धि में सहायक हैं। इसके लिये उदार चित्त होना आवश्यक है।
कार्य परमात्मा…. फल/ भगवान/ सिंधु।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

बोतलें भर भर कर रक्तदान करते हैं, उसमें तकलीफ महसूस नहीं करते लेकिन मच्छर अगर एक बूँद खून ले जाए तो बिलबिला जाते हैं।
कारण ?
संकल्प का ना होना।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 20 अप्रैल)

रोग पैदा तो होता है मन में, पनपता है शरीर में।
जिस क्षेत्र में रोग होता है, निदान भी उसी क्षेत्र में पाया जाता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 19 अप्रैल)

प्यासे को मिर्च खिला दो तो पानी तो आएगा पर कंठ में नहीं, आँखों में दिखेगा। लेकिन प्यास बुझाएगा नहीं। यह तो मृगमरीचिका से भी ज्यादा खतरनाक स्थिति है।
इसीलिए कहा है कि अज्ञान से बदतर कुज्ञान है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 15 अप्रैल)

मनुष्य पर्याय बहुत पुरुषार्थ से मिली है।यदि हमने प्रमाद( गर्मियों में तो बिस्तर भी कहता है कि जल्दी उठ, पसीने से बिस्तर तर हो रहा है/ दुर्गंध आ रही है) और लोभवश अपना ओटीपी दे दिया तो ध्यान रखना, हमारे आसपास बहुत से हैकर्स बैठे हुए हैं जो हमारे पुण्य का बैलेंस जीरो कर सकते हैं !

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 14 अप्रैल)

जब मृत्यु निश्चित है तो डर क्यों?

  1. अपने कर्मों तथा कर्म-सिद्धांत पर विश्वास की कमी।
  2. ध्यान/ Meditation के अभ्यास की कमी (जो ध्यान में मृत्यु का साक्षात्कार नहीं करते)।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – )

प्राय: हम उन पर उपकार करते हैं जिन्होंने पहले हम पर उपकार किया हो।

  • यदि सभी यही सोचेंगे तो उपकार करने की पहल कौन करेगा ! श्रृंखला शुरु कैसे होगी !!
  • पूर्व उपकारी का उपकार करके तो हमने कर्जा़ चुकाया। आगे हमारा उपकार हो उसका बीजारोपण तो हुआ ही नहीं।

चिंतन

ज्ञान की प्रमाणिकता जानने का साधन ?
चारित्र।
तभी तो कहा है → बिना अभ्यास ज्ञान विष समान। चारित्र ज्ञान की भाषा है।
कुलीनता/ अकुलीनता, कुटिलता/ सरलता, पवित्रता/ अपवित्रता की पहचान भी चारित्र से ही होती है।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

क्या वास्तु दोष भगवान के मंदिरों पर भी प्रभाव डालते हैं ?
वास्तु का अर्थ है भवन और मंदिर भी एक भवन ही है।
ग्वालियर के नए बाजार मंदिर में क्या वास्तुु दोष थे व पत्थर का वैभवशाली क्यों ?
1) मुख्य प्रवेश दक्षिण-पश्चिम में था।
2) मूलनायक प्रतिमा व अन्य प्रतिमाओं का मुख आग्नेय(अग्नि) कोण में था।
3) वॉशरूम(शौचालय) मंदिर की इमारत से चिपटा था।
4) कहीं पर भी, कुछ भी छोटा-मोटा निर्माण कर दिया गया था। जिससे भुजादोष लगता है जैसे लूला आदमी। 5) शिखर में दरारें पड़ गईं थीं। 6) पानी टपकता था।
7) सपोर्ट देने के लिए गर्डर लगाए जा रहे थे।
पत्थर का मंदिर इसलिए बनवाया जा रहा है ताकि हजारों साल चल सके क्योंकि 150-200 साल पुराना मंदिर बदलने का मानस और मौका जल्दी-जल्दी नहीं आता हालांकि करोड़ों वाली कार 2,4 वर्षों में बदल लेते हैं।
मंदिर वैभवशाली इसलिए ताकि संसारी रागी लोग आकर्षित हो सकें।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान- 10 अप़ैल)

प्रतिक्रमण में श्रमण अपने को जड़ बुद्धि, पापी आदि से संबोधित करता है पर श्रावक उन्हें ज्ञानी और पुण्यात्मा आदि कहते हैं।
यही तो अनेकांत है AND ‌‌‌‌एंड जबकि एकांत में END एंड।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 11 अ‌‌प्रैल)

  1. युद्ध में हवाई जहाज गोलियाँ खाकर लौटे।
  2. सोच → जहाँ गोलियाँ लगीं उन स्थानों को और मजबूत किया जाय।
  3. सम्भावना → जो प्लेन लौटकर नहीं आये उनको गोलियाँ अन्य स्थानों पर लगी होंगी। उन स्थानों को मजबूत किया जाय।

सीख दोनों से लेनी चाहिये, सफलता तथा असफलता।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

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