क्या वीतरागता संवेदनहीनता नहीं है ?
संवेदना बाह्य है। गृहस्थ भी बाह्य में रहते हैं, उन्हें संवेदनशील होना चाहिये।
साधु अंतरंगी, उन्हें वीतरागी।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

कुछ दुःख Unavoidable होते हैं जैसे शारीरिक अस्वस्थता, आर्थिक, सामाजिक। पर ज्यादा दुःख Avoidable/ self-created/ हमारा चयन होता है, Actual में वे दुःख होते ही नहीं हैं।
जैसे माँ के 4 पुत्रों में 1 धर्मात्मा, 3 नास्तिक। माँ के निधन पर तीनों ने मिलकर धर्मात्मा को बहुत पीटा।
कारण ?
तू ही मंदिर जाता था, तभी भगवान को याद आ गया कि इनकी माँ तेरे साथ रहती है। उसकी उम्र हो गयी है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

दिगंबर साधु तपस्या में लीन थे। चोर नग्न साधु को अपशकुन मानकर उपसर्ग करने लगा।
उपसर्ग समाप्त होने पर साधु ने चोर से कहा –> पहले क्यों नहीं आये ? मेरे कर्म पहले ही कट जाते।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

आत्मा को समझाने की आवश्यकता नहीं, वह तो ही खुद समझदार है, आत्मा को समझना है।
ऐसे ही भगवान/ गुरु को समझना है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

प्रश्न यह नहीं कि शक्ति कितनी है, सामग्री या संपत्ति कितनी है! प्रश्न है कि व्यक्ति कैसा है? यह तीनों साधन तो अधम को भी मिल जाते हैं। ये तो अवनति के कारण हैं; विरले ही इनके माध्यम से प्रगति करते हैं।
पिछले जन्म से रत्न की गाड़ी लेकर आए थे, क्या कचरा भर के वापस जाना चाहते हैं?
प्रश्न यह नहीं कि सीढ़ी है या नहीं; प्रश्न है कि सीढ़ी कहाँ लगी है! कुएं के पास, नीचे जाने के लिए या छत के पास, ऊपर चढ़ने के लिए?
व्यक्ति नहीं, अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण है; अभिप्राय महत्वपूर्ण है। मधुर व्यवहार लोकप्रिय बनने के लिये / प्रसिद्धि पाने के लिए अपनाया है अथवा आत्मस्वभाव के निकट आने के लिए?

आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी (22 अक्टूबर)

रसना को नागिन क्यों कहा ?
इसी के चक्कर में आकर Overeating करके पेट/ सेहत में ज़हर घोलते हैं।
इसी से ज़हरीले वचन निकलते हैं और बोलकर मुँह रूपी बिल में नागिन की तरह छुप जाती है।

चिंतन

साधु और गृहस्थ दोनों संसार में, पर संसार में साधु तथा गृहस्थ में संसार।
गृहस्थ संसार का स्वाद जानता (उसमें आनंद लेता) है, साधु संसार का स्वरूप जानता है, उसके लिये संसार में रहना जरूरी है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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