लाना पड़ता
है मन का बुढ़ापा
आता कभी ना

मुनि श्री निराकुलसागर जी

आर्यिका विशालमति, जो आर्यिका विज्ञानमति से ज्येष्ठ हैं, ने उनसे ब्रह्मचर्य पर कुछ लिखने को कहा। बड़ी माताजी की प्रेरणा और सलाह से उन्होंने ‘शीलमञ्जूषा’ पुस्तक लिख दी और लेखक के रूप में बड़ी माताजी का नाम डाला।
विशालमति माताजी ने चोरी का दोष मान कर नमक छोड़ दिया। अंतत: दोनों का नाम डलवाया गया।

(अंजू – कोटा)

समाधि कब ?
जब इंद्रियाँ शिथिल होने लगें पर मन में उत्साह बना रहे।
उत्साह कैसे बनाए रखें/ बढ़ाएँ ?
भगवान/ गुरुओं का जय-जयकार करके।
(युद्ध के दौरान भी इसका सफल प्रयोग किया जाता है)।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

दया, पूजा आदि करके हम दूसरे का कल्याण नहीं करते; उसे लाभ नहीं देते। हम तो अपना कल्याण करते हैं।

हमारे दान से ग़रीब को लाभ हो भी सकता है, नहीं भी। नुक़सान भी हो सकता है।

भगवान न तो ख़ुश होते हैं, न ही नाराज़।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

जो सब कुछ सर्वोत्तम चाहते हैं। वे अगले भव में द्रौपदी (पौराणिक परम्परानुसार) बनते हैं।
द्रोपदी ने 5 क्षेत्रों के सर्वोत्तम पति का वरदान मांगा था, जो एक व्यक्ति में तो सम्भव नहीं था।

चिंतन

मज़ा… संसार पर आश्रित। अल्प समय का।
*आनंद.. गुरु/ भगवान के निमित्त/ निकटता/ उनकी सेवा करने से।

 

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/24)

*(लंबे समय का या Permanent।)

इष्ट के साथ अनिष्ट भी जुड़ा रहता है जैसे प्रवचन इष्ट, इसमें अवरोध अनिष्ट।
बचपन में माँ इष्ट, बड़े होकर माँ अनिष्ट।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

क्या पैसा पुण्य से आता है ?
नहीं, यदि पुण्य से आता होता तो साधु को पुण्यहीन मानना पड़ेगा!
फिर ?
पुण्य की Background में पाप-क्रियाओं से कमाया जाता है।
साधु इस पुण्य को और पुण्य कमाने में लगाकर परमार्थ को बढ़ाते हैं।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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