संथारा- (श्वेताम्बर परंपरा) = आखिरी शयन,
Jumping Board – इस शरीर से दूसरे शरीर के लिये।
सल्लेखना – (दिगम्बरी परंपरा) – भीतर कषाय (क्रोधादि) को कृष करना तथा शरीर को कृष होते देखना, जब Unrepairable हो जाय तब पोषण/ पुष्ट करना छोड़ना।
समाधि – ( गृहस्थों को) = जहाँ आधि (मानसिक रोग/Tension), व्याधि (शारीरिक रोग), उपाधि – लोकेषणा, तीनों को छोड़ भगवान का नाम लेते हुए शरीर छोड़ना ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
भगवान/गुरु वाणी पानी की तरह होती है,
पानी पात्रानुसार आकार ग्रहण कर लेता है;
भगवान/गुरु वाणी भी पात्र के अनुसार खिरती है।
मुनि श्री अरुणसागर जी
The night hides a world,
but reveals a universe.
(J.L.Jain)
विशुद्धि कैसे बढ़ायें?
1. स्व-पर हित वाले कर्म करके
2. सन्तुष्ट/निराकुल रहकर
3. प्रतिकूलताओं में समता रखकर
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
आगे बढ़ने वाला व्यक्ति किसी को बाधा नहीं पहुँचाता।
आगे बढ़ने वाला तो रास्ता छोड़ता हुआ/ रास्ता बनाता हुआ/ बाधाओं को हटाता हुआ ही आगे बढ़ेगा न !
और बाधा पहुँचाने वाला कभी आगे नहीं बढ़ पाता।
(एन.सी.जैन)
तो आगे बढ़ने वाले की अनुमोदना करें क्योंकि वह आपके लिये बाधायें हटा रहा है।
चिंतन
जो साक्षर नहीं वे भी सच्ची श्रद्धा/ ज्ञान/ चारित्र प्राप्त कर सकते हैं।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
सुविधाओं में जितना उलझोगे, दुविधायें उतनी ही बढ़ेंगी।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
विश्वास उबारता है,
अविश्वास तथा अतिविश्वास दोनों ही डुबाते हैं।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
आज कोयल की आवाज़ इस सीज़न में पहली बार सुनी।
शुरु में तो अजीब सी आवाज़ आ रही थी, काफ़ी देर बाद सुरीला स्वर निकला।
कारण ?
8-9 माह का अंतराल आ गया था/ अभ्यास नहीं था।
चिंतन
भेद-विज्ञान श्रद्धा तथा ज्ञान से नहीं होता बल्कि प्रज्ञा से होता है।
जैसे दूध में से घी को अलग करना सिर्फ ज्ञान से नहीं विधिवत क्रिया से होता है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
जीर्णोद्धार पुराने मंदिरों का करते हैं/ आवश्यक भी है।
पर अपनी आत्मा का मंदिरों से भी ज्यादा आवश्यक तथा महत्वपूर्ण है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
मोह करते हैं,
कर्त्तव्य करना पड़ता है।
चिंतन
I will win not immediately but definitely.
ग्रह क्या करेंगे !
उतना ही मिलता है, जितना ले सकते हो (कर्मानुसार)।
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