धर्म / दान
आहार-दान धर्म है इसलिए देने तथा लेने वाले दोनों का धर्म बढ़ेगा। यदि साधु के पेट भरने का भाव आ जाए तो धर्म नहीं।
ऐसे ही आर्शीवाद जब अभय-दान बन जाता है तब बहुत कारगर बन जाता है। पर काम करेगा अपने से छोटों पर।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
आहार-दान धर्म है इसलिए देने तथा लेने वाले दोनों का धर्म बढ़ेगा। यदि साधु के पेट भरने का भाव आ जाए तो धर्म नहीं।
ऐसे ही आर्शीवाद जब अभय-दान बन जाता है तब बहुत कारगर बन जाता है। पर काम करेगा अपने से छोटों पर।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
One Response
धर्म/दान को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन में धर्म के लिए देव,शास्त्र,गुरु पर श्रद्बान करना परम आवश्यक है। धर्म में पुण्य अर्जित करने के लिए सात प़कार के दान देना परम आवश्यक है। अतः जीवन में पुण्य का उपयोग करना उचित नहीं है, अतः जीवन को पुण्य मय बनाने का प़यास करना चाहिए।