Category: अगला-कदम

आत्म वैभव

समयसार में कहा है – तत्व तत्व येव, चित् चित् मेव । यानि तत्व तत्व है, आत्मा – आत्मा है । आत्म वैभव – आत्म

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मान

सुंदरता अपनी आंखों से या दूसरे की आँखों से देखने की चीज है क्या ? कोई झूठी तारीफ़ भी कर दे तो हमारे मान की

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अवधिज्ञान

स्पर्श, रस, रूप और गंध का रस अवधिज्ञान से नहीं आता, इंद्रियों से ही आता है । इन्द्रिय ज्ञान Original है और अवधिज्ञान Carbon Copy

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सुभग

इसे देखते ही या नाम सुनते ही प्रेम/वात्सल्य/आत्मीयता उत्पन्न हो ।

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प्रमाद के 15 भेद

5 इन्द्रियों के विषयों में तल्लीनता, 4 विकथा – राज, चोर, स्त्री, भोजन 4 कषाय – क्रोध, मान, माया, लोभ, निद्रा, प्रणय । प्रमाद हिंसा

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कर्म-प्रकृति

जो कर्म-प्रकृतियां आगामी भव में उदय योग्य नहीं होतीं, उनका वर्तमान भव में बंध नहीं होता । जैसे लब्धिपर्याप्त तिर्यंच को देवगति, गत्यानुपूर्वी, नरकायु, वैक्रियक

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तीर्थंकर प्रकृति

तीर्थंकर प्रकृति का बंध पहले नरक में तो अपर्याप्त अवस्था में बंधता रहता है  , ( क्षायिक सम्यग्द्रष्टि के जैसे श्रेणिक महाराज ) दूसरे और तीसरे नरक

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तीर्थंकर प्रकृति

तीर्थंकर प्रकृति का बंध प्रारंभ तो मनुष्य पर्याय में ही होता है,  चौथे से सातवें गुणस्थान में । बाद में तीन गतियों ( तिर्यंच के अलावा

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मंगल आशीष

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