Category: अगला-कदम

21.1.21

इक्कीस = इक ईस पहला ईस = अरिहंत दूसरा ईश = सिद्ध दोनों के बीच “1”, मैं अकेला, ईश्वरीय गुणों/ शक्तियों से रक्षित । चिंतन

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एकेंद्रिय के कषाय

1. एकेंद्रिय जीवों के मिथ्यात्व होने से अनंतानुबंधी (+ तीनों) कषायें होती हैं । 2. निगोदियाओं के इस कषाय के कारण ही बार बार निगोदिया

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कर्म

क्षय तो सिर्फ 7 कर्मों का किया जाता है । 8वें आयु कर्म का तो संरक्षण किया जाता है । आचार्य श्री विद्यासागर जी

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द्रव्यों का चिंतन

द्रव्यों का उपादेय – जीवास्तिकाय, बाकी सब ज्ञेय । अज्ञानी की दृष्टि पुद्गल पर, थोड़ा ज्ञान होने पर जीवद्रव्य पर, ज्ञानी होने पर जीवास्तिकाय का

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नोकर्म

शरीर को नोकर्म कहते हैं, नोकर्म, कर्म की तरह राग-द्वेष में कारण हैं । शरीर-नामकर्म, 8 कर्मों में ही आते हैं । पं.रतनलाल बैनाड़ा जी

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गृहीत-मिथ्यात्व

गृहीत-मिथ्यात्व सिर्फ भरत/ऐरावत क्षेत्रों के मनुष्यों के ही और हुंडावसर्पिणी में ही होता है । मुनि श्री सुधासागर जी

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अनंतानुबंधी

दूसरे का नुकसान करने के लिये, अपना नुकसान सहने को तैयार । जैसे मैं मरूँ या ज़ीऊँ, दुश्मन को मिटाकर रहूँगा । मुनि श्री सुधासागर

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नामकर्म

शरीर के निर्माण में नामकर्म-वर्गणायें खुद शरीर नहीं बनातीं, वे शरीर निर्माण योग्य के योग्य वर्गणाओं को आकर्षित करतीं हैं, तब उनसे शरीर का निर्माण

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काल के प्रदेश

एक प्रदेशी “काल” को, अप्रदेशी भी कहा है; क्योंकि… 1. काल कभी बहुप्रदेशी नहीं बन सकता है । 2. “एक” का महत्व नहीं जैसे एक

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बंध / निर्ज़रा

बंध तो हमेशा होता ही रहता है, लेकिन जिनेंद्र भगवान की भक्ति करते समय ऐसी प्रकृतिओं का बंध होता है, जो बंध को काटने में

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मंगल आशीष

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