Category: वचनामृत – अन्य
राग
देह को तो राख बनना ही है। तो क्या राख से राग रखना समझदारी होगी ! आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
दान / त्याग
दान अच्छी चीज़ का, अच्छे के लिए। त्याग बुरी चीज़ का, अच्छे के लिए। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
संबंध
नदी/ सूरज हमसे संबंध बनाते नहीं, हम आगे बढ़कर बनाते हैं, प्यास बुझाने/ ताप लेने। भगवान/ गुरु से हमें ही Connect होना होगा। निर्यापक मुनि
शून्य
शून्य अंदर/ बाहर से खाली होता है। जिनका जीवन अंदर/ बाहर से खाली होता है, उनके जीवन में पूर्ण विराम लग जाता है। शून्य पूर्णता
धर्म / दान
आहार-दान धर्म है इसलिए देने तथा लेने वाले दोनों का धर्म बढ़ेगा। यदि साधु के पेट भरने का भाव आ जाए तो धर्म नहीं। ऐसे
लाड़ / डाँट
लाड़ से खुशी सुरक्षित, डाँट से हित। इसीलिए गुरु शिष्य को डाँट लगाकर रखते हैं। आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…. पर डाँट इतनी तगड़ी
इच्छा / इज़्ज़त
कुछ बड़ा चाहिए तो जो है उसकी महिमा बढ़ाओ (बखान करो)/ उसके विज्ञापन बनो। जिस धर्म/ व्रतादि से तुम्हारी इज़्ज़त बढ़ी है, तुम उस धर्म/व्रतादि
दुःख का कारण
सब मनुष्यों के जन्म, मरण तथा दुःख समान ही होते हैं। दुःख समान कैसे ? क्योंकि सबके दुःखों के कारण “भ्रम” ही होते हैं। जैसे
दान
अभक्ष्य खाने वाले को, अभक्ष्य देना दान में नहीं आएगा। क्योंकि दान तो स्व-पर हितकारी होता है। अभक्ष्य देने में स्व का अहित तो है
मोह
मोह कम/ समाप्त कैसे होता है ? संसार/ सम्बन्धों को क्षणिक/Temporary मानने, उसका बार-बार चिंतवन करने से। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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