Category: वचनामृत – अन्य

अहिंसा / अनुकम्पा

अहिंसा मुनियों के लिये क्योंकि उनके पास अनुकम्पा करने के साधन नहीं होते हैं। अनुकम्पा तो गृहस्थों के लिये होती है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर

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गुरु

गुरु कोई व्यक्ति नहीं शक्ति हैं। जो हमको कभी नज़रों से, कभी आशीर्वाद से और कभी भावनाओं से बिना कहे/ बिना कुछ करे शक्ति देते

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अनेकांत

जितना कीमती हीरा, उतने ज्यादा कोण। ऐसे ही जिस व्यक्ति के जितने ज़्यादा दृष्टिकोण, वह व्यक्ति उतना ही ज़्यादा महान। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

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मोह / राग

मोह हो तो राग बढ़ता है, राग हो तो मोह। क्षु. श्री सहजानन्द जी

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साँस

साँस ही जीवन है। जितनी अधिक साँस व्यय करेंगे उतना जीवन नष्ट होगा। यदि प्राणायाम नहीं कर सकते तो लम्बी-लम्बी गहरी साँस लें। निर्यापक मुनि

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सत्य

सत्य प्रकट करने की अगर ज़िद ही है तो अपना सत्य प्रकट करें, तुम्हारा तुरंत लाभ, देखने वाले प्रभावित होंगे और वे भी प्रेरित होंगे

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उपलब्धि / संतोष

उपलब्धि थोड़े समय का संतोष है, संतोष हमेशा की उपलब्धि। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

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भगवान से संबंध

यदि भगवान से एकत्व स्थापित कर लिया तो वे कभी विभक्त नहीं होने देंगे। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

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चोरी का माल

चोर घोड़ा चुरा कर बेचने खड़ा हुआ। कीमत तो मालूम नहीं थी सो बहुत ज्यादा बता रहा था। ग्राहक लौट रहे थे। एक ने कहा

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सीख

खाओ-पीओ, चखो मत*। देखो-भालो, तको मत। हँसो-बोलो, बको मत। खेलो-कूदो, थको मत। मुनि श्री मंगलसागर जी * बार-बार खाना।

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मंगल आशीष

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