Category: वचनामृत – अन्य

भगवान से सम्बंध

यदि भगवान से एकत्व स्थापित कर लिया तो वे कभी विभक्त नहीं होने देंगे। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

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चोरी का माल

चोर घोड़ा चुरा कर बेचने खड़ा हुआ। कीमत तो मालूम नहीं थी सो बहुत ज्यादा बता रहा था। ग्राहक लौट रहे थे। एक ने कहा

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सीख

खाओ-पीओ, चखो मत*। देखो-भालो, तको मत। हँसो-बोलो, बको मत। खेलो-कूदो, थको मत। मुनि श्री मंगलसागर जी * बार-बार खाना

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निस्पृहता

आचार्य श्री विद्यासागर जी को बताया –> आप सुबह 3-4 बजे से लेकर रात तक इतनी मेहनत करते हैं, एक ग्लास दूध ले लिया करिये,

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धार्मिक क्रियायें

टी.वी. आदि के निमित्त से धर्म खूब हो रहा है, तो धर्म का ह्रास कैसे और क्यों कहा ? जितनी धार्मिक क्रियायें हो रही हैं,

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चाहत

हम धनादि/ पुत्रादि से ज्यादा अपने को चाहते हैं। जैसे दर्पण को नहीं, उसमें अपने को देखते हैं, दर्पण को तो निमित्त बना लेते हैं।

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मोह

मोह प्राय: निकृष्ट/ लुटोरों/ खचोरों से ही होता है। क्षु. सहजानंद जी (सज्जन लूटेगा/ खचोरेगा नहीं)

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निराकुलता

अतिभाव तथा अतिअभाव दोनों ही आकुलता देते हैं।* समभाव से ही निराकुलता आती है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी *(अतिनिर्देश भी)

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अहंकार

अहंकार… राजा भोज के दरबार में एक ज्ञानी ने कोरे कागज पर बिना कुछ लिखे बताया कि इस कागज पर एक सुंदर कविता लिखी है।

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बहुलता

पौधे कम खाद देने पर कम मरते हैं, ज्यादा खाद देने पर ज्यादा। शरीर/ संसार के लिये Excess ज्यादा हानिकारक है। मुनि श्री मंगलानन्द सागर

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मंगल आशीष

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