Category: वचनामृत – अन्य

आशीष / शाबाशी

शाबाशी अच्छे/ बुरे कामों पर भी। इससे अहंकार आता है। आशीष सिर्फ अच्छे कामों के लिये ही। इससे अहंकार घटता है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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कर्म

कर्म चोर बहु फिरत हैं… यह कहावत सही नहीं है। कर्म तो साहूकार हैं, उनका कर्ज़ा कभी चुकता नहीं है। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

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इच्छा

क्या भगवान भक्तों की ही इच्छा-पूर्ति करते हैं, या जो भी शरण में आता है, उसकी? भगवान किसी की भी इच्छा-पूर्ति नहीं करते। जो भी

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अच्छाई / सच्चाई

सामने वाले में अच्छाई दिखे तो उसे सच्चाई मानो (भरोसा, परखकर)। अपनी अच्छाई के पीछे सच्चाई परखो। परिवार/ समाज में सच्चाई को गौण कर अच्छाई

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आकांक्षा

कांक्षा का नुक़सान… संसार तथा परमार्थ दोनों में फल पर दृष्टि रहती है सो धर्म/ कर्त्तव्य पर कम हो जाती है। इससे विशुद्धि/ शांति भी

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मन्दिर

मन्दिर जाना बन्द कर दिया क्योंकि वहाँ झगड़े/ विसंवाद होते हैं। दुकान/ घर में भी तो होते हैं, वहाँ जाना/ रहना बन्द किया क्या? मुनि

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राग

देह को तो राख बनना ही है। तो क्या राख से राग रखना समझदारी होगी ! आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

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दान / त्याग

दान अच्छी चीज़ का, अच्छे के लिये। त्याग बुरी चीज़ का, अच्छे के लिये। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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सम्बन्ध

नदी/ सूरज हमसे सम्बन्ध बनाते नहीं, हम आगे बढ़कर बनाते हैं, प्यास बुझाने/ ताप लेने। भगवान/ गुरु से हमें ही Connect होना होगा। निर्यापक मुनि

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शून्य

शून्य अंदर/ बाहर से खाली होता है। जिन‌का जीवन अंदर/ बाहर से खाली होता है, उनके जीवन में पूर्ण विराम लग जाता है। शून्य पूर्णता

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मंगल आशीष

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