Category: वचनामृत – अन्य

शोधन

भोजन में बाल आदि आने पर उसे निकाल कर बाहर फेंक देते हैं। कटु वचन/घटना को ? उसे तो सर पर बैठा लेते हैं, वह

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पुरुषार्थ

प्राय: लोग कहते हैं –> हम पुरुषार्थ नहीं कर सकते हैं। पर हम भूल जाते हैं कि मनुष्य गति, अच्छा कुल आदि पाने के लिये

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स्थिति

परिस्थिति जो “पर” में स्थित हो। यह आपके हाथ नहीं। लेकिन पूरा पुरुषार्थ करने तथा आशावान रहने से स्व-स्थिति बदल जाती है। तब परिस्थिति भी

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धर्म

धर्म स्व-आश्रित ही नहीं, पर निमित्तक भी है। साधुजन भी गृहस्थों की भोजन व्यवस्था लेते हैं। काया के आश्रित तो साधु तथा गृहस्थ दोनों रहते

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सच्ची मिठास

ना काफ़ी (मिठास), नाही फीका, सच्ची मिठास प्राकृतिक। काफ़ी मिठास – जलेबी में पर मायाचारी का प्रतीक, फीका मिठास – रसगुल्ले में पर मिलावटी (पनीर

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लोरी

संसारी माँ बच्चों को लोरी सुलाने के लिये सुनाती है। धर्म-माँ* बड़ों को जगाने के लिये। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी *जिनवाणी (धार्मिक ग्रंथ)/ गुरु-वाणी।

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आदर्श

खाओ-पीओ, चखो मत; देखो-भालो, तको मत; हँसो-बोलो, बको मत; खेलो-कूदो, थको मत। मुनि श्री मंगलानन्दसागर जी

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आत्मा / अनात्मा

प्राय: दूसरों से अधिक से अधिक सुख लेना चाहते हैं। जैसे मिठाई मेरी थाली में है पर Common में से पहले और ज्यादा से ज्यादा

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हार का कारण

दुर्योधन के पास बड़ी सेना, दोनों गुरु, बड़े-बड़े गुरुजन, फिर भी हारा। कारण ? गुरुजनों से चाहता था। पांडव गुरुजनों को चाहते थे। निर्यापक मुनि

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भगवान बनना

भगवान बनने के लिए (श्री रयणसार के अनुसार) – पहले भक्त बनो। किसके ? देव-शास्त्र-गुरु के, देव/ गुरु प्रपंच रहित, शास्त्र विवाद/ विरोध रहित हैं।

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मंगल आशीष

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