Category: वचनामृत – अन्य
धनवान
आचार्य मानतुंग के अनुसार धनवान वह जो अपने धन का उपयोग धनहीनों को धन, पुण्यवानों को आहार दानादि, बराबर वालों को सहयोग प्रदान करता हो।
अहिंसा / अनुकम्पा
अहिंसा मुनियों के लिये क्योंकि उनके पास अनुकम्पा करने के साधन नहीं होते हैं। अनुकम्पा तो गृहस्थों के लिये होती है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर
गुरु
गुरु कोई व्यक्ति नहीं शक्ति हैं। जो हमको कभी नज़रों से, कभी आशीर्वाद से और कभी भावनाओं से बिना कहे/ बिना कुछ करे शक्ति देते
अनेकांत
जितना कीमती हीरा, उतने ज्यादा कोण। ऐसे ही जिस व्यक्ति के जितने ज़्यादा दृष्टिकोण, वह व्यक्ति उतना ही ज़्यादा महान। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
मोह / राग
मोह हो तो राग बढ़ता है, राग हो तो मोह। क्षु. श्री सहजानन्द जी
साँस
साँस ही जीवन है। जितनी अधिक साँस व्यय करेंगे उतना जीवन नष्ट होगा। यदि प्राणायाम नहीं कर सकते तो लम्बी-लम्बी गहरी साँस लें। निर्यापक मुनि
सत्य
सत्य प्रकट करने की अगर ज़िद ही है तो अपना सत्य प्रकट करें, तुम्हारा तुरंत लाभ, देखने वाले प्रभावित होंगे और वे भी प्रेरित होंगे
उपलब्धि / संतोष
उपलब्धि थोड़े समय का संतोष है, संतोष हमेशा की उपलब्धि। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
भगवान से संबंध
यदि भगवान से एकत्व स्थापित कर लिया तो वे कभी विभक्त नहीं होने देंगे। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
चोरी का माल
चोर घोड़ा चुरा कर बेचने खड़ा हुआ। कीमत तो मालूम नहीं थी सो बहुत ज्यादा बता रहा था। ग्राहक लौट रहे थे। एक ने कहा
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