Category: वचनामृत – अन्य
अपेक्षा / इच्छा
अपेक्षा परावलम्बी, इच्छा स्वावलम्बी। इच्छा में अपेक्षा का होना हानिकारक। श्रद्धा में अपेक्षा/ इच्छा नहीं, इसलिये लाभकारी। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
जीना
जीना उसी का नाम है, जिन्होंने जीना (सीढ़ी) बना दिया (मोक्षमार्ग) जैसे आचार्य श्री विद्यासागर जी ने। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
धर्म
धर्म 2 प्रकार का – व्यक्ति सापेक्ष → सब अपने-अपने भावों को परिष्कृत करते हैं। वस्तु सापेक्ष → वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। निर्यापक
अनुकम्पा
दो प्रकार की अनुकम्पा –> सामान्यजन के प्रति अनुकम्पा। साधुजन के प्रति अनुकम्पा। इसमें विशेष पुण्य/ लाभ मिलेगा। Feeling विशेष होगी क्योंकि Object Higher Quality
सुख
सबसे कम शब्दों/ समय में सुख की परिभाषा बता दें। गुरु मौन हो गये। थोड़ी देर बैठ कर जिज्ञासु चला गया। अगले दिन आभार प्रकट
साधु / गृहस्थ
साधु की Dress एक, Address अनेक। गृहस्थ की Dress अनेक, Address एक। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
भरोसा
कच्चा घड़ा है, काम में मत लेना, बिना परीक्षा। आचार्य श्री विद्यासागर जी
आलोचना
आलोचना की आदत पड़ जाती है (प्राय: पीठ पीछे), निंदा → सामने वाले को नीचा दिखाने को (प्राय: व्यक्ति के सामने), समालोचना → सामने वाले
मोह
जब हमें कोई धोखा देता है/ हमारा अहित करता है, उसे हम बैरी मानते हैं। लेकिन मोह युगों से हमें धोखा देता आ रहा है/
प्रवृत्ति / निवृत्ति
प्रवृत्ति में व्यवहार, नीति, धर्म। निवृत्ति में निश्चय, अध्यात्म। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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