Category: वचनामृत – अन्य
व्यक्ति / गुण
व्यक्तियों से जुड़ोगे तो मोह। गुणों से जुड़ोगे तो धर्म। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
धर्म
प्राय: धर्म में आस्था तो होती है, निष्ठा (स्थिरता) नहीं, इसलिए धर्म टिकता नहीं। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
दानादि
दानादि… देव, शास्त्र, गुरु को। सहयोग……… किसी को भी। भेंट……… अपने से बड़ों को। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
शक्ति
सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं… इच्छा तथा संकल्प शक्तियाँ। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
विशालता
विशालता जिसकी कोई सीमा ना हो जैसे आकाश/ विचार/ भगवान का सुख, ज्ञान। एक रूप/ न वृद्धि/ न ह्रास। संसारी सुख कम-ज्यादा इसलिए विशाल नहीं।
जियो और जीने दो
साधु का “जियो” कमज़ोर*, गृहस्थ का “जीने दो”। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी * अपने शरीर पर ध्यान कम, आत्मा/ धर्म/ समाज पर अधिक।
अनन्त
अनन्त संख्या को कैसे समझें ? अनन्त वह जिसमें आय न हो, सिर्फ़ व्यय ही व्यय हो पर संख्या अनन्त रहे, जैसे भविष्य आज अनन्त
सुख
संसारी सुख… हर सुख के पीछे दु:ख जैसे भोजन बनाने में दु:ख, उसे सुख की आशा कि परिवारजन खुश होंगे। दु:ख का प्रतिकार ही
नॉनवेज क्यों नहीं ?
नॉनवेज में हिंसा का कारण बताने पर कुतर्क दिए जायेंगे। समझायें कि यह गंदा होता है क्योंकि इसमें खून, मांस, हड्डी आदि होते हैं। जबकि
आधुनिक उपकरण
क्या भगवान के ज्ञान में आधुनिक उपकरण मोबाइल आदि नहीं था? यदि था तो उन्होंने ऐसे सुविधाजनक उपकरणों के बारे में बताया क्यों नहीं? पिता
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