Category: वचनामृत – अन्य

धर्म / दान

आहार-दान धर्म है इसलिये देने तथा लेने वाले दोनों का धर्म बढ़ेगा। यदि साधु के पेट भरने का भाव आ जाय तो धर्म नहीं। ऐसे

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लाड़ / डांट

लाड़ से खुशी सुरक्षित, डाँट से हित। इसीलिये गुरु शिष्य को डाँट लगाकर रखते हैं। आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…. पर डाँट इतनी तगड़ी

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इच्छा / इज़्ज़त

कुछ बड़ा चाहिए तो जो है उसकी महिमा बढ़ाओ (बखान करो)/ उसके विज्ञापन बनो। जिस धर्म/ व्रतादि से तुम्हारी इज़्ज़त बढ़ी है, तुम उस धर्म/व्रतादि

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दुःख का कारण

सब मनुष्यों के जन्म, मरण तथा दुःख समान ही होते हैं। दुःख समान कैसे ? क्योंकि सबके दुःखों के कारण “भ्रम” ही होते हैं। जैसे

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दान

अभक्ष्य खाने वाले को, अभक्ष्य देना दान में नहीं आएगा। क्योंकि दान तो स्व-पर हितकारी होता है। अभक्ष्य देने में स्व का अहित तो है

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मोह

मोह कम/ समाप्त कैसे होता है ? संसार/ सम्बन्धों को क्षणिक/Temporary मानने, उसका बार-बार चिंतवन करने से। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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मोह

जैसे कीचड़ से कीचड़ नहीं धुल सकती है, वैसे ही मोह से मोह धुलता नहीं है, बल्कि बढ़ता ही है। क्षु. श्री सहजानंद जी

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धोखा

धोखे से कमाये गये धन को पुण्य में लगाने पर पुण्य उसको मिलेगा जिसको धोखा दिया गया था। गुरु गोविन्द सिंह

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घमंड

हम इन्द्रियों का बहुत घमंड करते हैं। कानों से सुने, आँखों से देखे को ही सही मानते हैं। क्षु. श्री सहजानंद जी</span

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धनवान

आचार्य मानतुंग के अनुसार धनवान वह जो अपने धन का उपयोग धनहीनों को धन, पुण्यवानों को आहार दानादि, बराबर वालों को सहयोग प्रदान करता हो।

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मंगल आशीष

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