Category: वचनामृत – अन्य

आकांक्षा

कांक्षा का नुक़सान… संसार तथा परमार्थ दोनों में फल पर दृष्टि रहती है सो धर्म/ कर्त्तव्य पर कम हो जाती है। इससे विशुद्धि/ शांति भी

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मन्दिर

मन्दिर जाना बन्द कर दिया क्योंकि वहाँ झगड़े/ विसंवाद होते हैं। दुकान/ घर में भी तो होते हैं, वहाँ जाना/ रहना बन्द किया क्या? मुनि

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राग

देह को तो राख बनना ही है। तो क्या राख से राग रखना समझदारी होगी ! आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

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दान / त्याग

दान अच्छी चीज़ का, अच्छे के लिये। त्याग बुरी चीज़ का, अच्छे के लिये। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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सम्बन्ध

नदी/ सूरज हमसे सम्बन्ध बनाते नहीं, हम आगे बढ़कर बनाते हैं, प्यास बुझाने/ ताप लेने। भगवान/ गुरु से हमें ही Connect होना होगा। निर्यापक मुनि

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शून्य

शून्य अंदर/ बाहर से खाली होता है। जिन‌का जीवन अंदर/ बाहर से खाली होता है, उनके जीवन में पूर्ण विराम लग जाता है। शून्य पूर्णता

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धर्म / दान

आहार-दान धर्म है इसलिये देने तथा लेने वाले दोनों का धर्म बढ़ेगा। यदि साधु के पेट भरने का भाव आ जाय तो धर्म नहीं। ऐसे

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लाड़ / डांट

लाड़ से खुशी सुरक्षित, डाँट से हित। इसीलिये गुरु शिष्य को डाँट लगाकर रखते हैं। आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…. पर डाँट इतनी तगड़ी

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इच्छा / इज़्ज़त

कुछ बड़ा चाहिए तो जो है उसकी महिमा बढ़ाओ (बखान करो)/ उसके विज्ञापन बनो। जिस धर्म/ व्रतादि से तुम्हारी इज़्ज़त बढ़ी है, तुम उस धर्म/व्रतादि

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दुःख का कारण

सब मनुष्यों के जन्म, मरण तथा दुःख समान ही होते हैं। दुःख समान कैसे ? क्योंकि सबके दुःखों के कारण “भ्रम” ही होते हैं। जैसे

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मंगल आशीष

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