Category: वचनामृत – अन्य
भाव कर्म आदि
सिर्फ़ भाव-कर्म/पूजा/मुनि आदि का महत्त्व नहीं। भाव सहित कर्म/पूजा/मुनि का महत्त्व होता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
कर्म-बंध
गाड़ी आगे चले या पीछे ईंधन तो खपेगा ही। सुकर्म करें या दुष्कर्म, कर्म तो बंधेंगे ही। गाड़ी आगे जाने पर गंतव्य पहुँचोगे, पीछे जाने
समाधि
समाधि कब ? जब इंद्रियाँ शिथिल होने लगें पर मन में उत्साह बना रहे। उत्साह कैसे बनाए रखें/ बढ़ाएँ ? भगवान/ गुरुओं का जय-जयकार करके।
स्व-पर कल्याण
दया, पूजा आदि करके हम दूसरे का कल्याण नहीं करते; उसे लाभ नहीं देते। हम तो अपना कल्याण करते हैं। हमारे दान से ग़रीब को
विकल्प
जिसको विकल्पों में रस नहीं, उसे रसों का विकल्प नहीं। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
मज़ा / आनंद
मज़ा… संसार पर आश्रित। अल्प समय का। *आनंद.. गुरु/ भगवान के निमित्त/ निकटता/ उनकी सेवा करने से। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र –
इष्ट / अनिष्ट
इष्ट के साथ अनिष्ट भी जुड़ा रहता है जैसे प्रवचन इष्ट, इसमें अवरोध अनिष्ट। बचपन में माँ इष्ट, बड़े होकर माँ अनिष्ट। मुनि श्री प्रणम्यसागर
पैसा / पुण्य
क्या पैसा पुण्य से आता है ? नहीं, यदि पुण्य से आता होता तो साधु को पुण्यहीन मानना पड़ेगा! फिर ? पुण्य की Background में
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