Category: वचनामृत – अन्य
परिग्रह
पाँचों पाप रोग-रूप हैं। हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील के तो लक्षण दिखते हैं और उनका इलाज सम्भव है, पर परिग्रह के लक्षण अंतरंग हैं।
अंगदान
अंगदान… करुणा, अभय, औषधि (निरोग करना) दान में आयेगा। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 5-4-22)
विकास
संसार तथा परमार्थ में विकास के लिये … एक आदर्श होना चाहिये जैसे भगवान। आदर्श को समझने के लिये गुरु का अवलम्बन ज़रूरी है। उनके
छोटों को महत्व
छोटों को महत्व… इकाई से ही दहाई आदि बड़ी-बड़ी संख्यायें बनतीं हैं। इकाई को महत्व नहीं देंगे तो दहाई बनेगी कैसे ! मुनि श्री सुप्रभसागर
पढ़ाई
ज्यादा पढ़े तो घर से जाये, कम पढ़े तो हल* से जाए। *खेती के काम के नहीं, ज्ञान बिना खेती कैसे होगी ! निर्यापक मुनि
जैन साधु
जैन साधु की पहचान, पदयात्री तथा करपात्री। पदयात्री – जीवनपर्यन्त पैदल चलते हैं। करपात्री – जीवनपर्यन्त हाथ में भोजन करना/ बर्तनों में नहीं। मुनि श्री
नारियल
नारियल को “श्रीफल” इसके अनेक गुणों के कारण कहते हैं। अन्य फलों से इसमें एक और विशेषता होती है कि यह रस अलग से बनाता
क्षत्रिय
जो पापों पर घात करे, उन्हें जीते वह क्षत्रिय । मुनि श्री अजितसागर जी (सबसे बड़े दुश्मन तो पापकर्म ही हैं)।
वर्ण लाभ/संकर
वर्ण लाभ… दोनों वर्णों को लाभ जैसे दूध और पानी। वर्ण संकर… दूध में नीबू जैसे देहाकर्षण से शादी/ गुणवत्ता को गौण करके। मुनि श्री
मूल से जुड़ना
जब तक पुष्प मूल से जुड़ा रहता है तब तक ही उसकी सुंदरता और सुगंधि बनी रहती है। मुनि श्री विनम्रसागर जी
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