Category: वचनामृत – अन्य

नियति / पुरुषार्थ

फ़ेल होने को (घटना घटने के बाद) नियति मानना, वरना अवसाद में घिर जाओगे। पास होने को भी भाग्य मानना, वरना घमंड आ जायेगा। पर

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भाग्य / पुरुषार्थ

“समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता” यह नीति है, सिद्धांत नहीं क्योंकि सिद्धांत तो सब पर लागू होता है,

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विकार

महर्षि पराशर नाव से नदी पार कर रहे थे। सुन्दर युवती अकेले नाव खे रही थी। महर्षि के मन में विकार आ गया, युवती से

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विभाव

लम्बी बीमारी/दवाईयों का लम्बा प्रयोग भी आदत बन जाती है। ऐसे ही लम्बे समय तक विभाव में रहने से हम उसे अपना स्वभाव मानने लगते

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प्रकृति

सुंदरता प्रकृति की देन है, सूखे पत्ते तक को खाद बना देती है। उसको उजाड़ता मनुष्य ही है, देवता उजाड़ते नहीं, नारकी उजाड़ सकते नहीं,

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गुरु/भगवान की शक्त्ति

कौरवों के हारने का महत्त्वपूर्ण कारण – जो ब्रम्हास्त्र कर्ण ने मुख्य योद्धा अर्जुन के लिये रखा था, उसे घटोत्कच पर प्रयोग करने में बर्बाद

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अज्ञान

बंद आँख में अंधेरा सुहाना लगने लगता है, आँख खुलने पर पता लगता है कि क्या-क्या खोया ! मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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संसार

संसार/मिथ्यादर्शन का Test – मंदिर जा जाकर/धार्मिक क्रियायें करते-करते बोर होना/थकना/ऊबना। धार्मिक क्रियाओं से सम्यग्दृष्टि का आनंद/उत्साह बढ़ता है। मुनि श्री सुधासागर जी

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मनुष्य

हाथी लाख का, मरे तो सवा लाख का; मनुष्य नाक का, मरे तो ख़ाक का; पर मानता है अपने को लाखों का। मुनि श्री प्रणम्यसागर

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सपना

दिन का हो या रात का, सपना सपना होय; सपना अपना सा लगे, किन्तु न अपना होय। आचार्य श्री विद्यासागर जी दिन के सपने मोह

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मंगल आशीष

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