Category: वचनामृत – अन्य
संतोष
साधु और पापी दोनों में ही संतोष दिखता/होता है। बस दोनों की मंज़िलें विपरीत दिशा में होतीं हैं। शकुनि ने अपनी बहन के साथ हुये
वृद्धावस्था
गन्ना पुराना, रस कम, निकालने में मेहनत ज्यादा, सो रस की कीमत भी ज्यादा। वृद्धावस्था कबाड़े की चीज़ नहीं, Antique है/ कीमती है। मुनि श्री
फटे में पैर डालना
दूसरों के यहाँ कुछ भी अच्छा/बुरा हो, हम कहते हैं – दूसरों के फटे में मैं क्यों पैर डालूँ। पर कर्म भी तो दूसरे हैं,
सम्बंध
प्राय: बेटे की कामना करते हैं पर केरल में बेटी की (गाय/भैंस के बछ्ड़ी की) वास्तविकता यह है कि न हमको बेटे से मतलब है
शिक्षा
लौकिक शिक्षा का अंत नहीं, धार्मिक शिक्षा से बहुत कम में बहुत काम हो जाता है; इसे रटना नहीं पड़ता, सिर्फ समझना होता है ।
कर्म-फल
कर्म किया तो फल मिलेगा। सेवक ने नहलाया तो सेवक को रोटी मिलेगी। सेठ को नहलाया तो बची रोटी, भगवान को तो पहली रोटी, चुपड़ी,
ज्ञान
हे ! दीमको, शास्त्रों को खा-खा कर अपने नाम/दाम की भूख मत मिटाओ, संस्कार/संस्कृति बनाने में ज्ञान का उपयोग/प्रभावना करो । मुनि श्री प्रमाणसागर जी
नियतिवाद
नियतिवाद जीवन के अंतिम दिनों में चलेगा। लेकिन पहले आ गया तो समझना, जीवन का अंत आ गया। मुनि श्री सुधासागर जी
बंधु
बंधु वह जो हितकारी हो, चाहे पराया ही क्यों ना हो । अपने ही शरीर में होने वाली बीमारी – अबंधु, जंगल की औषधि –
सुख
सुख अपनों में ही नहीं, बाहर वालों में भी । दूसरों को सुखी बनाने का सुख, अपने सुख से ज्यादा होता है । पूर्ण सुख
Recent Comments