बड़ों के प्रति नम्रता कर्तव्य है,
तो हम-उम्र के प्रति विनय की सूचक,
अनुजों के प्रति कुलीनता की द्योतक एवं सबके प्रति सुरक्षा है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

पाँचों पाप रोग-रूप हैं।
हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील के तो लक्षण दिखते हैं और उनका इलाज सम्भव है, पर परिग्रह के लक्षण अंतरंग हैं। बाहर से कोई इलाज नहीं कर सकता।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

1st Compartment में Reservation है (मनुष्य हो न!),
पर स्टेशन पर लेट पहुँचे(इस जीवन का अधिकतर समय तो विषय भोगों में बर्बाद ही कर दिया),
तब भी कम से कम आखिरी बोगी तो पकड़ लो, अगले स्टेशन (जन्म में) पर 1st बोगी (साधु अवस्था) में आ जाना।

चिंतन

साधना की पृष्ठभूमि…….विरक्त्ति,
आराधना की पृष्ठभूमि…अनुरक्त्ति,
शब्द अपने आप में…अभिव्यक्त्ति,
मौन…………………… व्यक्त्ति है।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

संसार तथा परमार्थ में विकास के लिये …

  • एक आदर्श होना चाहिये जैसे भगवान।
  • आदर्श को समझने के लिये गुरु का अवलम्बन ज़रूरी है।
  • उनके बताये रास्ते पर चलने के लिये आचरण चाहिये ( इसमें साधर्मीजनों की मुख्य भूमिका रहती है। वे सद्मार्ग पर चलने में सहायक तथा अकेलापन महसूस नहीं होने देते )।

मुनि श्री विनम्रसागर जी

छोटों को महत्व…
इकाई से ही दहाई आदि बड़ी-बड़ी संख्यायें बनतीं हैं।
इकाई को महत्व नहीं देंगे तो दहाई बनेगी कैसे !

मुनि श्री सुप्रभसागर जी

विचार किया !… जरा से आलस से (बिजली न जलाना/ लापरवाही से चलना) हम अपने जूतों के नीचे कितने कीड़ों की लाशों को लेकर घूम रहे हैं!
कभी जूतों को पलट कर देखा !!

ब्र. डॉ. नीलेश भैया<र/p>

क्या मृत्यु में वेदना होती है?

(एन. सी. जैन – नोयडा)

नहीं बीमारी/ Accident की वेदना हो सकती है।
पक्षियों आदि को देखें कितनी शांति से देह छोड़ते हैं।
समाधिमरण करने वाले साधु/ गृहस्थों का अंत समय देखें, भगवान का स्मरण करते हुए शांति/ आनन्द से देह त्याग करते हैं।

( गुरुवर मुनि श्री क्षमा सागर जी / सौम्य सागर जी)

कौन किसके पीछे भागता है?
घर वालों के पीछे पाप या पाप के पीछे घर वाले?
बड़े तो पाप के पीछे ही भागते हैं इसलिये पाप छोटों के पीछे भागता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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