दया तो आत्मा का स्वभाव है, हर जीव में पाया जाता है, अपने बच्चों के प्रति हिंसक जानवरों तक में।
जैसे-जैसे आत्मा विशुद्ध होती जाती है, पहले मनुष्यों पर दया, फिर जानवरों, कीड़े मकोड़ों, अंत में सूक्ष्म जीवों पर भी।

चिंतन

अभक्ष्य खाने वाले को, अभक्ष्य देना दान में नहीं आएगा।
क्योंकि दान तो स्व-पर हितकारी होता है। अभक्ष्य देने में स्व का अहित तो है ही, “पर” का भी धार्मिक/ आत्मिक स्तर पर अहित होगा।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

सापेक्ष…
तीन मित्र घूमने निकले।
घोंघा कछुए की पीठ पर, शिकायत करता रहा –> धीरे चलो।
साथ में खरगोश को कछुए से शिकायत थी ——> इतना धीरे क्यों चल रहे हो ?

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

ज्ञान दो साधनों से –>
1. वस्तु(अजीव) जगत से… इसमें स्थायीपना होता है सो प्रामाणिक है जैसे आग जलाती है। आजकल इसका आदर बहुत बढ़ गया है।
2. जीव जगत से…इसमें स्थिरता नहीं। आदर घट गया है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

भाग्य / पुरुषार्थ…
एक प्रसिद्ध ज्योतिषी ने मेरी उम्र 62 वर्ष बतायी थी। फिर थोड़ा धर्म/ अनुशासित जीवन किया तो 72 वर्ष पर आ गया। तब धर्मादि और बढ़ाये, 80 वर्ष तक आ चुका हूँ, लगता है 82 वर्ष होने की सम्भावना है।

चिंतन

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