संगति…
गंगा का शुद्ध जल भी नाली में गंदा हो जाता है।
चिंतन
शुभ… यानी अशुभ से दूर।
लाभ… यानी फायदा –> संसार में धनादि का (धर्म में आत्मकल्याण का)।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
हम इन्द्रियों का बहुत घमंड करते हैं।
कानों से सुने, आँखों से देखे को ही सही मानते हैं।
क्षु. श्री सहजानंद जी</span
Jainism –> “How to Live” ही नहीं, “How to Die” भी है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
आचार्य मानतुंग के अनुसार धनवान वह जो अपने धन का उपयोग धनहीनों को धन, पुण्यवानों को आहार दानादि, बराबर वालों को सहयोग प्रदान करता हो।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
बारात के पीछे हॉर्न बजाने से फ़ायदा कुछ नहीं,
नुकसान –> आकुलता, ध्वनि-प्रदूषण।
बेहतर है नाच लो –> कलुषता कम होगी, न्योछावर राशि में नोट भी मिल जाएँ।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया</span
आत्मा शरीर के माध्यम से भोग करती है। तभी तो शरीर पर चींटी, अनुभव आत्मा करती है।
आत्मा निकलने के बाद बिच्छू भी काट ले तो अनुभव नहीं।
प्रश्न… फिर मरने पर “राम/ अरिहंत नाम सत्य” क्यों सुनाते हैं ?
मुर्दे को नहीं, ले जा रहे लोगों को सुनाते हैं।
चिंतन
अहिंसा मुनियों के लिये क्योंकि उनके पास अनुकम्पा करने के साधन नहीं होते हैं।
अनुकम्पा तो गृहस्थों के लिये होती है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
गुरु कोई व्यक्ति नहीं शक्ति हैं। जो हमको कभी नज़रों से, कभी आशीर्वाद से और कभी भावनाओं से बिना कहे/ बिना कुछ करे शक्ति देते रहते हैं।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
जितना कीमती हीरा, उतने ज्यादा कोण।
ऐसे ही जिस व्यक्ति के जितने ज़्यादा दृष्टिकोण, वह व्यक्ति उतना ही ज़्यादा महान।
निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
जीना और जाना तो निश्चित है।
कैसे जाना/ क्या करके जाना ताकि आगे का जीवन अच्छे से जी सकें, यह हमारे हाथ में है।
चिनाई में पुरानी ईंटें, नई ईंटों की दिशा और दशा निर्धारित करती हैं।
ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया
साधना की सीमा क्या होनी चाहिये ?
साध्य की प्राप्ति तक।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
अपने मकान/ मच्छरदानी में एक छोटे से मच्छर का भी प्रवेश वर्जित है।
अपनी आत्मा में दुश्मनों का भी प्रवेश वर्जित नहीं !
चिंतन
मोह हो तो राग बढ़ता है,
राग हो तो मोह।
क्षु. श्री सहजानन्द जी
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