मंदिर से लौटते समय दूरी पर सत्संगी बहन दिखायी दीं ।
समझ नहीं पा रहा था कि वे मंदिर की ओर आ रही हैं या मंदिर से दूर जा रहीं है !
सही निर्णय किसी के पास आने पर ही होता है ।

चिंतन

बंधु वह जो हितकारी हो, चाहे पराया ही क्यों ना हो ।
अपने ही शरीर में होने वाली बीमारी – अबंधु,
जंगल की औषधि – बंधु ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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अहंकार सत्य को स्वीकार नहीं करता है,
और
सत्य को जानने वाला कभी अहंकार नहीं करता है।

जय जिनेंद्र

????????(अनुपम चौधरी)????????

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ख़ामोशी/ स्थिरता का भी अपना ही मज़ा है,
पेड़ों की जड़ें कभी फड़फड़ाया नहीं करतीं…
पत्ते फड़फड़ाते हैं तो सूख कर या टूट कर गिर ही जाते हैं।

????(मंजू)????

हाथ में ज्यादा पत्ते होने से खिसकने की संभावना ज्यादा हो जाती है (उतना ही रखो जितना सम्भाल सकते हो) ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

सुख अपनों में ही नहीं, बाहर वालों में भी ।
दूसरों को सुखी बनाने का सुख, अपने सुख से ज्यादा होता है ।
पूर्ण सुख – कुछ घर का, कुछ बाहर का ।
अपने में से दूसरों को कितना दिया ?
कमाई बिना टैक्स दिये जेल की सज़ा ।
बिना दान – दुर्गति ।

मुनि श्री सुधासागर जी

धरती/आसमान मिलते दिखाई देते हैं, पर हैं नहीं ।
आत्मा/शरीर भी एक रूप दिखते हैं, पर हैं नहीं ।
अज्ञानी इस भ्रम में शरीर को ही सब कुछ मानकर उसकी सब मांगों से भी ज्यादा देता है, उसे बिगाड़ देता है जैसे लाड़-प्यार में बच्चों को बिगाड़ देते हैं ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

शरीर भोजन से ही नहीं वातावरण से भी ग्रहण करके स्वस्थ रहता है ।
बचपन में ग्रहण ज्यादा, खर्च कम ।
उम्र के साथ ग्रहण कम होता जाता है, खर्च ज्यादा ।
चिंता/तनाव से खर्चा तेज होता जाता है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

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