वैज्ञानिक आइंस्टीन की सालों की मेहनत अचानक प्रयोगशाला में आग लगने से समाप्त हो गई।
आइंस्टीन…. अच्छा हुआ मेरी गलतियाँ समाप्त हो गईं, अब नये सिरे से बेहतर काम शुरु करुँगा।
एकता – पुणे
नदी/ सूरज हमसे संबंध बनाते नहीं, हम आगे बढ़कर बनाते हैं, प्यास बुझाने/ ताप लेने।
भगवान/ गुरु से हमें ही Connect होना होगा।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
शून्य अंदर/ बाहर से खाली होता है।
जिनका जीवन अंदर/ बाहर से खाली होता है, उनके जीवन में पूर्ण विराम लग जाता है। शून्य पूर्णता का प्रतीक है। (जिस अंक के पीछे भी लगा दो तो उसकी कीमत बढ़ जाती है)।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
आहार-दान धर्म है इसलिए देने तथा लेने वाले दोनों का धर्म बढ़ेगा। यदि साधु के पेट भरने का भाव आ जाए तो धर्म नहीं।
ऐसे ही आर्शीवाद जब अभय-दान बन जाता है तब बहुत कारगर बन जाता है। पर काम करेगा अपने से छोटों पर।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
लाड़ से खुशी सुरक्षित, डाँट से हित।
इसीलिए गुरु शिष्य को डाँट लगाकर रखते हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…. पर डाँट इतनी तगड़ी मत लगा देना कि शीशी से दवा निकले ही नहीं(उद्देश्य पूरा होगा ही नहीं)।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
भगवान महावीर से उनके सबसे बड़े शिष्य गौतम जी ने पूछा… आप भी इस संसार में, मैं भी; पर आप अबद्ध (संसार/ कर्मों से), मैं बद्ध।
ऐसा कैसे ?
एक आम के पेड़ पर दो तोते। एक आम चख रहा है(बद्ध), दूसरा पेड़ पर रहते भी तटस्थ बैठा है (अबद्ध)।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
अंधकार… प्रकाश का अभाव।
छाया……. प्रकाश का अवरोध।
चिंतन
इंद्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये मन को असंतुष्ट रखें। मीठा मन को अच्छा लगता, सो और-और मांगता है, जिव्हा नहीं।
(असंतुष्ट मन बुझ आता है फिर ज़िद नहीं करता है)।
आचार्य श्री समयसागर जी
अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये धनोपार्जन आदि क्षेत्रों में निवेश करते रहते हैं।
शुद्ध विचारों का निवेश नहीं करेंगे तो शुद्ध का उत्पादन कैसे होगा ?
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
सामूहिक पूजा करते समय, प्रायः लोग सामग्री पटकते हैं। सलीके से चढ़ायें, तो टेबल/ थाली सुंदर दिखे।
सामने वाला बायें पर डाले तो आप दायें चढ़ाएँ, वो बिगाड़े आप सुधारें। एक सुंदर कृति उभरती जायेगी, देखने में आनंद देगी।
चिंतन
- दूसरा (जैसा) बनने के लिये की खुद/ निजता की हत्या करनी पड़ती है। फिर भी दूसरे तो बन नहीं पाते।
- दूसरे को आदर/ प्रमुखता देने से खुद में हीनता।
- आप Photocopy बन भी गये तो कीमत 2 रुपये।
- चोरी (व्यक्तित्व) की, सफलता 10% को।
- विभाव में चाहते हुए भी टिक नहीं सकते, स्वभाव में वापस आने से रोक नहीं सकते।*
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
* Leopard can not change its spots.
धार्मिक क्रियाएँ तो बहुत लोग बहुत सारी करते हैं पर धर्मात्मा वही जो सुख (पुण्योदय) में दुःखी हो (कि भोगना पड़ रहा है) तथा दुःख (पापोदय) में सुखी हो (कि पाप कर्म कम हो रहे हैं)।
दीपा जैन – अमेरिका
कुछ बड़ा चाहिए तो जो है उसकी महिमा बढ़ाओ (बखान करो)/ उसके विज्ञापन बनो।
जिस धर्म/ व्रतादि से तुम्हारी इज़्ज़त बढ़ी है, तुम उस धर्म/व्रतादि की इज़्ज़त बढ़ाओ।
(तुम्हारी इज़्ज़त और बढ़ेगी)।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
सब मनुष्यों के जन्म, मरण तथा दुःख समान ही होते हैं।
दुःख समान कैसे ?
क्योंकि सबके दुःखों के कारण “भ्रम” ही होते हैं। जैसे सोते में समुद्र में डूबने से उभरने का उपाय…
जागना/ तत्व ज्ञान।
क्षु. सहजानंद जी (सुख यहाँ)
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