मनुष्य जो पाता है,
सो भाता नहीं,
इसलिये साता आता नहीं ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
1. समभाव – सब जीवों पर ।
2. ममभाव – कम करें ।
3. प्राणायाम – शरीर शुद्धि से भाव शुद्धि भी ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
मन निषेध के प्रति आकर्षित होता है, यदि निषेध दूसरे के द्वारा आरोपित किया जाये तो।
खुद के द्वारा निषेध लगाने पर मन उधर नहीं जाता।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
आचार्य श्री विद्यासागर जी के विरुद्ध किसी ने पुस्तक छपवा दी।
मुझे (महाराज जी) बहुत बुरा लगा।
आचार्य श्री से आशीर्वाद मंगवाया जबाब देने के लिये ।
आचार्य श्री – आपको ऐसी पुस्तकें पढ़ने का समय कैसे मिला ?
क्या तुमने सारे धार्मिक ग्रंथ पढ़ लिये ?
धार्मिक ग्रंथ पढ़ने से क्रोधादि शांत होते हैं, ऐसी पुस्तकों को पढ़ने से क्रोधादि अशांत होते हैं।
मैंने (महाराज जी) आधी पुस्तक पढ़ी थी, आगे पढ़ना बंद करके रख दी।
मुनि श्री सुधासागर जी
तम्बू तानते समय खम्बा छोटा पड़ने पर छोटी सी चिप लगा देते हैं।
जीवन को Balance करने के लिये थोड़ा सा विवेकपूर्ण रवैया काफी होता है।
तुलसीदास जी के एक भक्त अपने वैभव आदि का श्रेय गुरु को देते थे।
तुलसीदास जी – ये वैभव आदि तो पापियों के भी होते हैं, गुरु से तो वह प्राप्त करो जो पापी प्राप्त नहीं कर सकते।
सुत दारा औ लक्ष्मी, पापी के भी होय ।
संत समागम हरिभजन, तुलसी दुर्लभ होय ।।
1. तामसिक – दूसरों को सताने – मरणांतक
2. राजसिक – अहंकार पुष्टि – दीर्घकाल
3. सात्विक – दूसरों की भलाई के लिये – अल्पकाल
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
हर नुकसान, नुकसान करके ही नहीं जाता, फायदा भी कर जाता है जैसे सिर में चोट लगने पर खून निकलना।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
शब्दों में क्या,
आत्मा में अर्थ छिपा,
कौन सोचता!
आचार्य श्री विद्या सागर जी
पं. बनारसीदास जी मुनियों की नकल करके 3 दिन तक कमरे में अकेले ध्यान करते रहे (गृहस्थों के आवश्यक कर्त्तव्य छोड़कर )
इस अनुभव को कहते हैं – ऊंट की सवारी, न आगे बैठ पाये न पीछे की ओर।
मुनि श्री सुधासागर जी
संसार के कानून मनुष्य ने बनाये, धर्म के किसने ?
ज़हर खाने से मरण की सज़ा, शाश्वत/ अनादि से/ प्राकृतिक नियम है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
पूरे दिन घने बादल छाये रहे, भानु के अस्तित्व का भी भान नहीं हो रहा है, उस जैसा प्रतापी भी मुंह छिपाये बैठा है ।
कर्म जब घनघोर छा जायें, तब शांत बैठकर धर्मध्यान करना ही समझदारी होती है ।
चिंतन
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