The more things change,
the more they remain the same.
(Gaurav)
एक निवाला पेट तक पहुंचाने का…नियति ने क्या ख़़ूब इंतजाम किया है…
अगर गर्म है, तो हाथ बता देते हैं ;
सख़्त है, तो दांत ;
कड़वा या तीखा है, तो ज़ुबान ;
बासी है, तो नाक बता देती है ;
बस मेहनत का है या बेईमानी का !…
इसका फैसला आपको करना है…!!
(मंजू)
जो कह दिये, वह शब्द थे ….
जो नहीं कह सके, वह अनुभूतियां थीं !
और….
जो कहना है, फिर भी नहीं कह सकते, वह मर्यादा है !!
????????सुरेश????????
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रिश्तों में झुकना कोई अज़ीव बात नहीं,
सूरज भी तो ढल जाता है, चाँद के लिए !
जीवन के कुछ संबंध ऐसे होने चाहिए !!
(सुरेश)
मांगने पर तो मूल्यहीन वस्तुयें ही मिलतीं हैं जैसे भीख ।
बिनमांगे मूल्यवान जैसे वृक्ष से छाया/ अग्नि से उष्णता/ वर्फ से शीतलता/ फूल से सुगंधि तथा भगवान से कृपा,
बस उनसे निकटता बनानी होगी ।
घड़ी बंद करने से घड़ी तो बंद हो सकती है, पर समय नहीं;
झूठ छिपाने से झूठ तो छुप सकता है, पर सत्य नहीं ।
आचार्य श्री सन्मति सागर जी
माँ सोचती है… बेटा आज भूखा ना रहे,
पिता सोचता है कि बेटा कल भूखा ना रहे ।
बस यही दो सम्बन्ध ऐसे हैं संसार में, जिनका दर्जा भगवान् के बाद में आता है..!
????जय जिनेंद्र????
(सुरेश)
संसार ज़रूरत के नियम पर चलता है…
सर्दियों में जिस सूरज का इंतज़ार होता है,
उसी सूरज का गर्मियों में तिरस्कार भी होता है ।
अतः आपकी कीमत तब होगी,
जब आपकी ज़रूरत होगी ।
????????(धर्मेन्द्र)????????
और ज़रूरत होती है…गुणों से ।
यूँ ही नहीं होतीं हाथों की लकीरों के आगे उँगलियाँ…!
रब ने भी किस्मत से पहले मेहनत लिखी है…!!
(सुरेश)
शास्त्र मित्रवत पर गुरु शत्रुवत व्यवहार करते दिखते हैं ।
मुनि श्री सुधासागर जी
सफलता की ऊंचाई पर हो तो धीरज ज़रुर रखना चाहिये,
क्योंकि…
पक्षी भी जानते हैं , कि आकाश में बैठने की जगह नहीं होती।
(दिव्या)
असल में वही जीवन की चाल समझता है…
जो सफ़र में आयी धूल को गुलाल समझता है ।
(अनुपम चौधरी)
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“चाबी” से खुला “ताला” बार बार “काम” में आता है,
और
“हथौड़े” से “खुलने” पर दुबारा काम का नहीं रहता ।
इसी तरह “संबन्धों” के ताले को “क्रोध” के “हथौड़े” से नहीं बल्कि “प्रेम” की “चाबी” से खोलें।
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(सुरेश)
घड़ी की सुईयाँ अपने नियम से चलती हैं,
इसलिए लोग घड़ी पर विश्वास करते हैं ।
आप भी नियम से चलोगे तो,
लोग आप पर भी विश्वास करेंगे ।
(सुरेश)
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